बशीर बद्र साहब जैसे फनकार मरते नहीं हैं , वो तो अपने प्रशंसकों और उनके फन के मुरीदों के दिल में हमेशा के लिये जिंदा रहेंगे ! बशीर बद्र साहब से कुछ 20 साल पहले श्यामला हिल्स स्थित एक दोस्त के घर पर मुलाकात हुई थी, वो भी दावत में बुलाये गये थे और हम भी किस्मत से आमंत्रित थे , मैं सांसारिक आदमी, मुझे गंभीर किस्म की बातों में, ऐसी शेरो शायरी में कोई दिलचस्पी नहीं थी I जैसे आम सांसारिक आदमी घर – गृहस्थी , बाल – बच्चे, इज्जत, कर्तव्य, व्यापार, नाते – रिश्तेदारी में फंसा रहता है मैं भी फंसा था, बस एक ही जुनून था कि फलां से आगे निकलना है, वो टेंडर हासिल करना है, इस बार कंपनी से थाईलैंड ट्रिप के लिये क्वालीफाई करना है ? संसार की रंगीनियाँ और असीमित कामनाएं जीवन में हावी थी ?
अब हम जैसे अज्ञानी को बशीर बद्र साहब से क्या वास्ता ? खैर जो जितना अज्ञानी होता है उतना ही वो झूठा ज्ञान दिखाने की कोशिश करता है, हमने भी कोशिश की तो बशीर साहब पहचान गये कि ये पूरी महफ़िल दुनियादारी के कुचक्र में फंसे हुए लोगों से भरी पड़ी है I ऐसा लगा जैसे बशीर बद्र कह रहे हों ..
है अजीब शहर की ज़िन्दगी न सफ़र रहा न क़याम है
कहीं कारोबार- सी दोपहर, कहीं बदमिज़ाज सी शाम है।
बशीर साहब का एक शेर है कि
” यारों की मोहब्बत का यक़ीं कर लिया मैंने
फूलों में छुपाया हुआ ख़ंजर नहीं देखा ”
अब हम जैसे संसार के पचड़ों में फंसे लोगों को क्या मोहब्बत और क्या खंजर का पता ? बनियों ( व्यापारी ) का तो पैसा ही मोहब्बत है और पैसा ही सुकून है , उनके लिये तो बशीर बद्र साहब एक निकम्मे आदमी थे जो दिन भर शेरो – शायरी कर कर के वक्त जाया करते थे I जो संसार की बाहरी दुनिया में कभी ना मिलने वाला सुकून ढूंढ रहा हो उसको बशीर बद्र की बेशकीमती सुकून भरी शायरी में क्या ही रस आयेगा ? बशीर साहब स्वार्थ परस्त दुनिया के लिये कह गये हैं कि
” ख़ुदा हम को ऐसी ख़ुदाई न दे
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे ”
बशीर साहब के इंतकाल के समय अब जब मिर्जा ग़ालिब याद आ रहे हैं तो गुलजार साहब और जगजीत सिंह का कालजयी सीरियल ‘मिर्जा ग़ालिब ‘ याद आता है, नसीरुद्दीन शाह की रूह में जैसे मिर्जा ग़ालिब की आत्मा घुस गयी थी !
” हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और ”
लेकिन साहब , बशीर साहब भी कुछ कमतर नहीं थे , उनकी लिखी शायरी का अंदाज निराला था .. कहते हैं
” घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला ”
आज बीस साल बाद समझ आया कि कुछ हासिल नहीं हुआ जमाने से, जवानी कुछ पाने के लिये और बुढापे के इंतेज़ाम में जाया कर दी और कमाल ये कि बर्बाद जवानी को तो छोड़िये, बुढ़ापे में रातें भी बेचैनी में करवटे बदलते हुए कटती हैं I सुकून तो खुद को पहचानने से मिलता है, बशीर बद्र साहब को जानना है तो खुद को पहचानना होगा I अब बशीर साहब के इस शेर का आशय समझ में आता है कि
” बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता ”
ऐसे रहनुमा शायर जिन्होंने अपनी शायरी के माध्यम से धर्म और जाति से ऊपर हमेशा इंसानियत को तवज्जो दी, जिनकी शायरी पूरी दुनिया के लिये सुकून का सबब बनी और आज सुकून और मोहब्बत के दुश्मन जाने क्या क्या सोशल मीडिया में ऊलजलूल मसले फैला रहे हैं ? ऐसी ही बेफजूल की बेसिर-पैर की बहस को हवा दे रहे हैं ? यही वो लोग तो थे जिन्होंने राहत इंदौरी साहब की मौत के बाद उनके अपमान में क्या क्या नहीं कहा ? मुनव्वर राणा जैसे उम्दा शायर, जिन्होंने पूरी दुनिया को अपनी शेरों शायरी से मंत्रमुग्ध कर दिया था , उनकी मृत्यु के बाद भी मोहब्बत के दुश्मनों द्वारा उनके तिरस्कार में बहुत कुछ कहा गया I
जनाजे में भीड़ का मुद्दा उठाने वाले ये वही नफरत के प्रायोजक हैं जो महात्मा गाँधी को भी गरियाते रहते हैं ? जनाजे में भीड़ को तलाशने वाले वहीं हैं जो शादी में जाने के पहले होटल का नाम देखते है, किसी के जनाजे में जाने से पहले मरने वाले की हैसियत देखते हैं और मरहूम के वारिसों की औकात देखते हैं , उठावने में जाने से पहले दिवंगत का रुतबा और ओहदा देखा जाता है और किसी की मदद करने के पहले उसकी बिसात देखी जाती है ? जनाजे में भीड़ का क्या है ? कभी वो माफिया किंग मुख्तार अंसारी के जनाजे और अंतिम संस्कार में उमड़ पड़ती है और कभी किसी संत के अंतिम संस्कार में नदारद होती है ?
किसी शिक्षाविद् या दर्शन शास्त्र के व्याख्यान के अवसर पर या किसी आध्यात्मिक ( spiritual ) समागम में चुनिंदा लोग ही दिखेंगे लेकिन किसी अनपढ़ कथावाचक के पाखंड में लाखों की संख्या में पहुँच जायेंगे या किसी बेवकूफ और जाहिल नेता के कार्यक्रम में मूर्खो की भारी भीड़ मिलेगी या किसी नचनिया या फिल्मों के भांडों के कार्यक्रम में कामनाओं से भरे लोगों का उन्माद देखते ही बनता है ?
भीड़ का किसी समाज से, किसी भी तरह के ज्ञान से कोई वास्ता नही होता, भीड़ का कोई विचार, कोई समझ नही होती, भीड़ का कोई धर्म नहीं होता, भीड़ की कोई चेतना नहीं होती, और जिसके पास कोई चेतना नहीं उसका बशीर साहब जैसे ऊँची चेतना के व्यक्तित्व के जनाजे में क्या काम ? इसी भीड़ के लिये तो बशीर साहब कह गये हैं कि
” हज़ारों भेस में फिरते हैं राम और रहीम
कोई ज़रूरी नहीं है भला भला ही लगे “
