पिछले दिनों डोंगरगढ़ की बम्लेश्वरी देवी के मंदिर जाने का सौभाग्य मिला, 2000 साल पुराना मंदिर डोंगरगढ़ की पहाड़ियों की 1600 फीट की ऊंचाई पर स्थित है, , 1000 सीढियाँ चढ़ कर बम्लेश्वरी देवी के दर्शन होते हैं I अब तो उड़न खटोले की व्यवस्था है, 150 रुपए की टिकट लेकर श्रद्धालु 5 – 7 मिनट में बम्लेश्वरी देवी के सामने पहुँच जाते हैं I रोप वे में बैठा मैं सोच रहा था कि 2000 पहले हमारे ऋषियों – संतों ने ये मंदिर कैसे खोजा होगा ? क्या प्रयोजन होगा मंदिर खोजने का ? श्रद्धालु कैसे पहुँचते होंगे मंदिर तक ? रोप वे तो क्या सीढ़िया भी नहीं होंगीं तब ? श्रद्धालुओं की तीव्र श्रद्धा उन्हें ऐसे दुर्गम जंगल और पहाड़ पर विराजमान देवी के दर्शन के लिये खींच के लिये ले आती होगी I उस समय ना शिक्षा होगी , ना विज्ञान था, ना अस्पताल होंगे, ना इलाज था , बस प्रभु के प्रति आस्था और श्रद्धा ही थी की देवी सब ठीक करेंगी I जब श्रद्धालु बम्लेश्वरी देवी के दर्शन के लिये ऊपर पहाड़ पर जाते होंगे तो जानते होंगे कि पता नहीं वापिस आयेंगे या नहीं, जानवरों से बच पाएंगे कि नहीं ? देवी के दर्शन करना और वापिस आ जाना किस्मत की बात होती होगी, मोक्ष की प्राप्ति होना होता होगा I
ये सोचते सोचते उड़न खटोले ने हमें मंदिर के पास उतार दिया, वहां देखा तो मंदिर की समिति के काउंटर में पोस्टर लगा था कि 250 रुपए जमा करिये और पंडित जी से व्यक्तिगत पूजन कराइये, हमने भी जमा कर दिये फिर 100 सीढ़ी चढ़ कर देवी के मंदिर के गर्भगृह के सामने पहुँच गये , पंडित जी को रसीद दिखाई तो उन्होंने मुख्य दरवाजे के बगल वाली खिड़की खोल दी और कुछ मंत्र पढ़े जो मेरी समझ के परे थे खैर पंडित जी ने हमारे द्वारा लाये गये प्रसाद, नारियल को देवी जी को समर्पित कर के कुछ प्रसाद हमें वापिस कर दिया I देवी के दर्शन के लिये बहुत श्रद्धालु थे, निर्धन थे, अति निर्धन भी थे, मध्यम वर्गीय थे , बच्चे थे, जवान, अधेड़ थे और प्रौढ़ भी थे, कहते हैं डोंगरगढ़ की देवी का मंदिर एक सिद्ध मंदिर है, यहां आदमी की मनोकामनायें पूर्ण होती हैं I ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मंदिर में सभी अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिये आये थे , बम्लेश्वरी देवी जी के दर्शन तो ठीक है असली प्रयोजन तो कामनाओं की पूर्ति का था I
खैर, देवी जी के दर्शन करते करते देर हो गयी जब तक रोप वे बंद हो चुकी थी तो हमने सीढ़ियों से उतरने का फैसला लिया ( बाकी कोई विकल्प भी नही था ) , सीढ़ी उतरने में जो नजारा देखा वो हतप्रभ करने वाला था, सीढ़ियों के दोनों तरफ दुकाने लगी थी, मिठाई की, खिलौनों की, माला की, समोसे की, भेलपुरी की, पेप्सी, कोकाकोला की, तरह तरह का सामानों का बाजार लगा था, लोग खा पी रहे थे, मजे कर रहे थे I ये सब नजारे देख के मैं फिर ख्यालों में खो गया कि ये सब श्रद्धालु हैं या पर्यटक ? खाने पीने और मौज करने की जगह तो पर्यटन स्थल ही होता है ? पहाड़ पर चढ़े, घंटा बजाया, सर झुकाया, कामनाओं की फेहरिस्त के नाम पर लाल पीली कपड़ों की चिंदियाँ मंदिर में बांध आये और मौज मस्ती करते लौट गये कि देवी जी सब ठीक करेंगी ? मैं फिर विचारों में खो गया और सोचने लगा कि हम मंदिर क्यों जाते हैं ? मंदिरों की आवश्यकता क्यों है ?
जैसे तन के लिये अस्पताल जरूरी हैं वैसे ही मन के लिये मंदिर जरूरी हैं I हम अस्पताल जाते हैं स्वस्थ होने के लिये और अगर शारीरिक तकलीफ ना मिटे तो दोबारा उस अस्पताल में नहीं जाते, दूसरा अस्पताल देखते हैं ? आप मंदिर जाते हैं तो क्या आप मंदिर से आने के बाद खुद से पूछते हैं कि जीवन के प्रति आपका दृष्टिकोण कुछ बदला क्या ? आपका मन स्थिर हुआ क्या ? जीवन के प्रति और स्पष्टता आई क्या ? बेचैनी, अशांत मन में शीतलता आई क्या ? बार बार जाईये मंदिर, बार बार ये बात पूछिये ? हर बार जिज्ञासा करिये ? बाहर के मंदिरों में जाने से बेचैनी और अशांति नही हट रही हो तो घर में मंदिर बनाइये ? सोचिये अगर आप हर मंगलवार को अस्पताल जाएं और अस्पताल के बाहर बनी दवाई की दुकानों से दवाई खरीदें उसके बाद दवाई का पैकेट ले के कंपाउंडर के पास जाएं और कंपाउंडर आपको डॉक्टर से ना मिलाये बल्कि पैकेट में से आधी दवाई निकालकर डॉक्टर के पास पहुंचा दे और आधी आपको दे दे तो क्या आपकी तबीयत ठीक हो जायेगी ? इसी तरह क्या मंदिरों में जाने से घण्टा बजा के, प्रसाद, दान – दक्षिणा चढ़ाने से आपकी मानसिक , आर्थिक, पारिवारिक तकलीफें दूर हो जायेगी ? ऐसा तो नहीं कि मंदिर जा के आपका अहंकार प्रबल तो हो रहा है ? कहीं आपके लिये मंदिर जाना एक रस्म बन कर तो नहीं रह गया है ? मंदिरों में ईश्वर को महसूस करिये, अपने लिये सही मंदिर चुनिए और भगवान से अपने लिये बोध, समझ, प्रेम और आत्मज्ञान से जीने का वरदान मांगिये I
