हमजोली फिल्म का ये गीत बड़ा ही चर्चित हुआ था, जितेंद्र और लीना चंदावरकर की जोड़ी चर्चा में आ गयी थी , बेटमिंटन कोर्ट में फिल्माया गया ये गाना बेजोड़ था, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का लाजवाब संगीत , ढल गया दिन .. टिक, हो गयी शाम .. टिक , जाने दो.. टिक, जाना है … टिक, गाने के बीच में रैकेट और शटल कॉक के मिलन से उभरी ये आवाज गीत को और सुमधुर बनाती है I गाना रिलीज़ होने के बाद हिंदुस्तान की जनता जितेंद्र और लीना चंदावरकर की अदायें देखकर पागल हो गयी थी I
लेकिन ठीक 57 साल बाद वकीलों , नेताओं और न्यायाधीशों की जोड़ी को लंदन के बेटमिंटन कोर्ट में देखकर हिंदुस्तान की जनता अपने बाल नोंच रही है ! लंदन में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय बार एंड बेंच बैडमिंटन चैंपियनशिप के अंतर्गत वकीलों और न्यायाधीशों की 150 लोगों की भीड़ अनायास ही भारत की भीषण गर्मी से राहत पाने के लिये बेटमिंटन खेलने लंदन पहुँच जाती है , बेटमिंटन तो बस बहाना था असली वजह तो गुलछर्रे उड़ाना था ? लंदन के खाली इनडोर बेटमिंटन अपनी किस्मत को रो रहे थे और तोंदू – फोंदू, ऐंड – बेंड, झूठे, बेईमान, धोती – कुर्ता पहने धरती के बोझ जब बेटमिंटन खेलते हुए सोशल मीडिया पर नजर आये तो ऐसा लगा की कोर्ट और संसद फट जाये और मैं हमेशा के लिये उसमें समा जाऊं ?
आज मुझे समझ आया कि हमजोली के बेटमिंटन वाले गाने में जो बीच में टिक – टिक की आवाज थी वो किसी ‘ साज ‘ की नहीं बल्कि हिंदुस्तान के गरीब किसान – मजदूर की ‘ आह ‘ की आवाज थी जो बेटमिंटन कोर्ट से नहीं भारत के न्यायालयों में बदहाल भटकते फरियादी, मुवक्किलों, गवाहों और पीड़ितों की थी जो सालों साल कोर्ट के चक्कर लगा – लगा के मरणासन्न हो जाता है लेकिन उसको न्याय नहीं मिलता ? और हमारे जजों – वकीलों की अटूट जोड़ियाँ अखंड फुर्सत में उन्ही हैरान – परेशान मुवक्किलों, चप्पलें घिसते फरियादी के पैसों से लंदन की आलीशान होटलों और लंदन की सड़कों पर अय्याशी काट रही थीं ?
कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल भी संभवतः वहीं थे लेकिन हो सकता है कि प्रधानमंत्री की मितव्यता की अपील के चलते नहीं भी गये हों लेकिन सवाल ये उठता है कि जनता के खजाने से 150 लोगों को विदेश जाने की इजाजत किसने दी ? प्रधानमंत्री की बातें क्या अब सिर्फ जनता ही सुनती है बाकी सब क्या सिर्फ ताली बजाने और देश की ‘ वाट ‘ लगाने के लिये ऊँचे – ऊंचे पदों पर बैठे हैं ? ठीक है केंद्रीय कानून मंत्रालय की चैंपियनशिप को प्रायोजित करने की कोई मजबूरी रही होगी लेकिन क्या जजों, नेताओं और वकीलों का स्वयं का कोई बोध नहीं, विवेक नहीं, समझ नहीं कि देश हित में अय्याशी और ऐशो आराम को कुछ समय के लिये टाल दिया जाये ? जज और वकील जीवन पर्यंत कोर्ट में करते क्या हैं ? चाहे गर्मी हो, ठंड हो या बरसात हो या हो बसंत .. बस आम जनता को इधर से उधर भटकाना, हर पेशी पर निराशा, वकीलों के तर्क – वितर्क के बीच जूझते मुवक्किल को अगली तारीख पर कुछ होने की उम्मीद जगाना ?
भारत में पड़ रही भीषण गर्मी से राहत पाना था, दुनिया के सबसे गंदे शहरों से कुछ दिन दूर जाना था, जहरीली हवाओं ( 200 – 300 AQI ) से बचना था तो न्यायाधीशों ने, वकीलों ने,, पूंजीपतियों ने प्रधानमंत्री की अपील के विरुद्ध विदेश घूमने का कार्यक्रम बनाया और बेटमिंटन खेलने निकल गये ? वकील और न्यायाधीश भारत में रहते हैं तो जनता को कोर्ट में शटल कॉक की तरह पीट पीट कर इधर – उधर कभी इस कोर्ट में तो कभी उस कोर्ट में फेंकते रहते हैं ! भारतीय वकील और जज बैडमिंटन बहुत अच्छा खेलते हैं क्योंकि उन्हें ‘ फुद्दी ‘ ( आम आदमी ) को पीटना, कुचलना, घुमाना, फेंकना बहुत अच्छे से आता है, वो शटल कॉक को हिंदुस्तानी आम आदमी समझ के मारते हैं और खूब मारते हैं और तब तक मारते हैं जब तक शटल कॉक ( आम आदमी ) के परखच्चे नहीं उड़ जाते ?
