आज सुबह अखबार के साथ चाय की चुस्कियां ले रहा था, ट्विशा शर्मा केस की खबरें कम होने का नाम ही नहीं ले रहीं, वैसे ही जैसे गिरीबाला सिंह का अहंकार से तना शरीर और तनी गर्दन झुकने का नाम ही नहीं ले रही , वैसे ही जैसे रावण के अट्टाहस की गूंज जब तक ब्रह्मांड में गूंजती रही जब तक प्रभु का बाण उसकी नाभि को भेद नहीं गया ? गिरिबाला सिंह का गुरूर, उसका रुतबा, उसका दंभ जस का तस है, चाहे सेवानिवृत जज ने उसके ही दोनों बेटों की जिंदगी खराब कर दी हो , चाहे एक बहू कि हत्या का इल्जाम उसके सर पर हो, चाहे उसको CBI ने गिरफ्तार कर लिया हो, चाहे वो उसी अदालत में मुल्जिम बन के कटघरे में खड़ी हो जहां वो न्यायाधीश थी या एक रिटायर्ड जज CBI की रिमांड पर हो ? झूठा अहंकार कोई कोई बहाना ढूंढ ही लेता हैं गुरूर को कायम रखने का ? अहंकार आदमी को झूठी दिलासा में रखता है, अहंकार इंसान को सत्य और प्रेम से दूर रखता है , अहंकार , आदमी को बोध, करुणा, समझ और विवेक से कोसों दूर ले जाता है ? जीवन में आनंद और मुक्ति से अहंकार को कोई लेना देना नहीं होता है .. अहंकार मैं मैं मैं मैं … करते करते एक दिन कब हलाल हो जाता है , उसको पता ही नहीं चलता … गिरिबाला सिंह की तरह ?
अखबार पढ़ते पढ़ते ही दिवंगत हुई आत्माओं को श्रद्धांजली देने वाले पेज पर नजर गयी तो अखबार को पैसे दे के छपवाया गया एक बड़ा सा श्रद्धांजली वाला विज्ञापन दिखा , ” जिसका जितना बड़ा विज्ञापन, उसका उतना बड़ा अहंकार ” , विज्ञापन में लिखा था कि फलां सांसारिक आत्मा की बड़ी सी दवाई की फैक्टरी है, रोड कंस्ट्रक्शन कंपनी है, होटल भी है, फलां समाज का अध्यक्ष रहा , फलां राजनीतिक पार्टी का सचिव रहा वगैरह वगैरह … क्षमा कीजियेगा उसका सम्राज्य था, झूठ, भृष्टाचार, चाटुकारिता से खड़ी की हुई उसकी सल्तनत थी , आदमी कर्मयोगी था, जुगाड़, बेईमानी का बादशाह था , श्रीमद्भगवद्गीता से एक श्लोक भी विज्ञापन में उद्धत था –
” I कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन मा कर्मफलाहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ” II
याने श्री कृष्ण कह गये हैं कि इंसान का अधिकार और कर्तव्य केवल कर्म करने में निहित है, न कि उनसे मिलने वाले फल या परिणामों पर दावा करने में ? इंसान इस श्लोक का यही अ(न)र्थ लिये जीता रहता है और मरने के बाद अखबार में आधे पेज का विज्ञापन खरीद कर और छपवाकर अहंकार की बेदी में सदा के लिये शांत हो जाता है ? इंसान समझ नहीं पाता कि श्री कृष्ण ने सार्थक कर्म की बात की है, ऐसे तो आतंकवादी भी पूरी शिद्दत से कर्म करता है और बूचड़ खाने का कसाई भी पूरी तन्मयता से अपना कर्म करता है ?
अहंकार लिये मनुष्य जीवन भर तड़पता रहता है लेकिन अहं के साथ ही जीता रहता है, बर्बादी के मंजर में भी अहंकारी अपने झूठे अहंकार को नहीं छोड़ता और तो और मरने के बाद भी उसका झूठा अहंकार उसके अंतिम संस्कारों में भी प्रकट होता दिखता है, क्योंकि अहंकार एक छुआछूत की जानलेवा असाध्य बीमारी है और अहंकारी के पिल्ले, अहंकारी के दंभ को मरने के बाद भी कायम रखते हैं ? सांसारिक, सामाजिक आदमी और कथित सेठ एक दिन समय की धूल बन जाते हैं लेकिन सत्य की राह पर चलने वाले महापुरुष जिन्होंने भीड़ के साथ चलने से इंकार कर दिया , जिन्होंने लाखों – करोड़ों लोगों को जीवन से उनके बंधन, बेड़ियों , मान्यताओं, रूढ़ियों, अंधविश्वास से मुक्ति दिलाने में अपना जीवन खपा दिया और जन – जन के जीवन को अध्यात्म, सत्य, प्रेम, बोध , करुणा, आत्मज्ञान की रोशनी से रोशन कर किया ? ऐसे संत पुरुष अमर हो जाते हैं I
जीवन में सार्थक लक्ष्य बनाओ और उस लक्ष्य को पाने के लिये अपने जीवन को झोंक दो, क्या बुद्ध, महावीर, कबीर, गुरु नानक देव, राजा राममोहन राय, शहीद भगत सिंह ,पंडित मदन मोहन मालवीय और महात्मा गाँधी क्या फैक्ट्री बना रहे थे या गरीबों का खून चूस के महल बना रहे थे ? या अय्याशी के साधन इकट्ठे कर रहे थे ? नहीं वो लोगों का जीवन बदल रहे थे, देश की दिशा बदल रहे थे ! उनको मरणोंपरांत विज्ञापन दे के कर्मों का हिसाब – किताब देने की जरूरत नहीं है, उनके कर्म तो सैकड़ों – हजारों साल बाद भी जिंदा हैं और आने वाली शताब्दियों तक लोगों की स्मृति में जीवंत बने रहेंगे I पैसा, महल, गाड़ी – घोड़े, ओहदा, रुतबा अहंकार के ही उत्पाद हैं और अहंकार इनके ही इर्द – गिर्द फलता – फूलता रहता है और जीवन पर्यंत अपना जीवन बेचैनी, दुख और तनाव में जीता है I
