ऐसे हादसों के बाद 2 – 4 दिन हंगामा बरपा जाता है , नेता औपचारिकता वश वोटर्स को सूंघने चले जाते हैं घड़ियाली आँसू बहाते हैं और उसके बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है I
अमीरजादों के लिये चारधाम यात्रा मे 8 लाइन हाईवे और पहाड़ों पर 5 स्टार होटेल्स बनाये जा रहे हैं , जहां बकरा चबाते हुए , जिम और जॉगिंग करते हुए ये भगवान के दर्शन करते हैं I
विकास के नाम पर शहर, पहाड़, जंगल बर्बाद किये जा रहे हैं, अतिवृष्टि हो रही है, भीषण गर्मी पड़ रही है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं, यही रहा तो पृथ्वी से मानव जाति का नामोनिशान ही खत्म हो जायेगा I
पृथ्वी को बर्बाद कर रहे हैं अमीर, पूंजीपति, कौन बचाएगा गरीबों को .. कथित समाजसेवी राजनीतिज्ञ ? असलियत ये है की हमारे राजनेता भी पूंजीपति बनकर गरीबों का खून ही पीना चाहते हैं !
मुक्ति की उड़ान / भोपाल
उत्तराखंड का पहाड़ी इलाका धराली, गंगोत्री से 18 किलोमीटर दूर, चार धाम के रास्ते में पड़ने वाला छोटा सा गांव जिसमे 15 – 20 होटल और कुछ घर बने हुए थे, पूरा गांव बाढ़ के तेज बहाव में नेस्तनाबूद हो गया, पानी के रास्ते में जो भी आया चाहे वो मवेशी हों या चट्टाने या पेड़, घर, आदमी सब कुछ बह गया, बर्बाद हो गया पूरा गांव शमशान में बदल गया I लोग चीखते रहे और सब कुछ काल के गर्त में समां गया, हँसता – खेलता गांव, बच्चे, परिवार, पर्यटकों की खुशियाँ मातम में बदल गयीं I पिछले साल वायनाड की घटना याद है ? या भूल गये ? वायनाड की लैंड स्लाइड की भयावह घटना जिसमें 300 से ज्यादा गरीब मजदूर काल की गर्त में समा गये थे, लोग सोये के सोये ही रह गये, बड़ी बड़ी चट्टानों ने , कीचड़ ने पूरा गांव ही ध्वस्त कर दिया था I
कुछ समय पहले उत्तराखंड के जोशी मठ में पहाड़ दरकने लगा था, किसी तरह से जोशी मठ अभी टिका हुआ है लेकिन पूरे जोशी मठ में दरारें पड़ी हुई हैं , शायद धराली या वायनाड जैसी किसी दर्दनाक हादसे का इंतेज़ार है I हिमाचल प्रदेश में बादल फटने की घटनाएं होती ही रहती हैं, लोगों की मौतें होती ही रहती हैं, लेकिन जिंदगी चल रही है , हादसों के बाद 2 – 4 – 10 दिन हंगामा बरपा जाता है 1 – 2 नेता औपचारिकता वश वोटर्स को सूंघने चले जाते हैं घड़ियाली आँसू बहाते हैं और उसके बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है I फिर वही पेडों का कटना, पहाड़ों पर अंधाधुंध होटलों और घरों का निर्माण चालू हो जाता है, पूंजीपतियों के उद्योगों के लिये ,खनिजों और सड़कों के लिये पहाड़ों और जंगलों का काटना बदस्तूर शुरू हो जाता है, बादल के फटने के कारण जल प्रलय की घटनाएं पिछले दशक से लगभग दुगुनी हो चुकी हैं, इसका कारण है विकास के नाम पर कंक्रीट का जंगल बिछाया जा रहा है, पहाड़ों पर पर्यटकों का आना भी इसका मुख्य कारण है, पर्यटक पहाड़ों पर जाकर करते क्या हैं ? भोग भोग भोग, मौज और पहाड़ों पर गंदगी, शराब और कोल्ड ड्रिंक की बोतलें और पन्नियाँ का ढ़ेर लगाकर पर्यावरण को खराब ही तो करते हैं I
चार धाम के लिये चकाचक 8 लाइन हाईवे बनाया जा रहा है , पहाड़ों का सीना काटकर लंबी – लंबी सुरंगे बनाई जा रही हैं, अंधाधुंध पेड़ काटे जा रहे है, डाइनामाइट लगाकर पहाड़ों को, प्रकृति को छलनी किया जा रहा है, लैंड स्लाइड होने का कारण ही यही है की पेडों की जड़ों के कारण पहाड़ों की मिट्टी, पत्थर जुड़े रहते हैं, पेड़ कटने से पहाड़ों की मिट्टी दरकने से लैंड स्लाइड की घटनाएं बहुत बढ़ चुकी हैं, लोग मर रहे हैं, रास्तों पर आये दिन ट्रैफिक जाम की स्थिति बन जाती है I 8 लाइन हाईवे बनाया जा रहा है किसके लिये ? जिनके पास लाखों रुपए की SUV हैं, दिल्ली से शराब पीते हुए, तरह तरह का भोग करते हुए, 150 की स्पीड से चलाते हुए , पहाड़ों पर 5 स्टार होटेल्स इन्ही अमीर जादों के लिये ही तो बनाई जाती हैं, जहां बकरा – मुर्गा चबाते हुए , जिम और जॉगिंग करते हुए, भगवान के दर्शन करते हैं I यही वो लोग हैं जो महंगी गाड़ियों से पहाड़ों पर कार्बन एमीशन करते हुए पहुँचते हैं या खुद के चार्टर प्लेन से, हेलिकोप्टर से प्रकृति को प्रदूषित करते हुए तीर्थाटन करते हैं और उसका परिणाम भुगतते हैं पहाड़ों पर रहने वाले मजदूर, गरीब अपनी जान दे के I धराली में यही तो हुआ है I वायनाड मे सारे मजदूर ही तो मारे गए थे, क्या सुना है कि एक भी चाय बगान का मालिक हादसे में मारा गया ? चार धाम यात्रा के दौरान प्रकृति के रौद्र रूप के शिकार कौन होते हैं ? गरीब और मध्यमवर्गीय जनता और जिनके कारण प्रकृति का सत्यानाश किया जा रहा है वो तो अपने अपने महलों मे, चार्टर प्लेन में, करोड़ों की गाड़ियों में, फाइव स्टार होटलों में, सेवन स्टार केम्पों में अय्याशी कर रहे होते हैं I
जलवायु परिवर्तन हमारे देश को, दुनिया को बर्बाद कर रहा है, पृथ्वी तो एक ही है , सीमित है, लेकिन GDP का खतरनाक खेल पूरी दुनिया में खेला जा रहा है, हमने किसी भी देश की खुशहाली को GDP ग्रोथ से जोड़ दिया है , पैसा है तो खुशी है, विकास के नाम पर शहर, पहाड़, जंगल बर्बाद किये जा रहे हैं, हादसे हो रहे हैं, कहीं अतिवृष्टि हो रही है, गर्मी में अति गर्मी पड़ रही है, हमारे ग्लेशियर पिघल रहे हैं, हम नहीं सुधरे तो पृथ्वी से मानव जाति का नामोनिशान ही खत्म हो जायेगा, एक शोध के अनुसार हम जितना भोग कर रहे हैं उसके लिये 17 पृथ्वी चाहिए ? कहाँ से लाओगे !
पृथ्वी को बर्बाद कर रहे हैं अमीर, पूंजीपति, जिनके पास अथाह दौलत है, धुंआ छोड़ती फैक्टरीज हैं, कार्बन एमीशन करते चार्टर प्लेन हैं, गाड़िया हैं, 5 स्टार सुविधाओं से युक्त याट हैं समुंदर को प्रदूषित करने के लिये I अरबपति हिंदुस्तान में सिर्फ 2% हैं, जिन्होंने बाजारवाद खड़ा किया है, सिर्फ 2% लोगों की अय्याशियों का मुआवजा 98% गरीबों को देना पड़ रहा हैं, वो जलवायु परिवर्तन का शिकार हो रहे हैं, प्रकृति के रौद्र रूप के शिकार हो रहे हैं I कौन बचाएगा इनको .. कथित समाजसेवी राजनीतिज्ञ ? वो तो सिर्फ बाते करते हैं, असलियत ये है की हमारे राजनेता भी पूंजीपति बनकर गरीबों का खून ही पीना चाहते हैं !
जब तक पूंजीपतियों और राजनेताओं का गठजोड़ चलता रहेगा , तब तक लद्दाख में पहाड़ खोदे जाते रहेंगे, तब तक हंसदेव अरण्य के जंगल खनन, कृषि, औद्योगिक विकास के नाम पर काटे जाते रहेंगे और निम्न मध्यमवर्गीय एवं गरीब जनता कीड़ों – मकोड़ों की तरह मौत के घाट उतारे जाते रहेंगे !
