सैयारा मूवी देखने का सौभाग्य मिला, भोपाल के ‘ अडानी ‘ के नये नवेले ‘ बंसल प्लाजा ‘ के बिल्कुल ताजा सिनेपोलिस थिएटर में !
हाल मे घुसा .. ज्यादातर युवा लड़के – लड़की गुटर गू कर रहे थे .. संपूर्ण हाल में अजब प्रेम बरस रहा था I
मध्यांतर में नजारा ये था कि बाहों मे बाहें डाले दुनिया से बेखबर चारों तरफ कृष और वीणा नजर आ रहे थे
बाहर ठेलों में चाउमिन बमुश्किल खाने वाले निठल्ले , 5 रुपए की कट चाय पीने वाले छछून्दर अपनी वीणा के लिये 300 रुपए के पॉपकॉर्न और 150 रुपए की कोल्ड ड्रिंक ले रहे थे
हम सब फिल्मों को ही तो जी रहे हैं, वैसे ही कपड़े, वैसा ही प्रेम, वैसी ही शादियाँ .. लड़के, प्रेमिकाओं में आलिया भट्ट ढूंढ रहे हैं और लड़कियाँ प्रेमियों में टाइगर श्रॉफ, रणबीर कपूर ढूंढ रही हैं
मुक्ति की उड़ान / भोपाल
सैयारा मूवी युवाओं के बीच खासी लोकप्रिय हो रही है, मूवी का क्रेज बना हुआ है, मुझे भी सैयारा मूवी देखने का सौभाग्य मिला, भोपाल के ‘ अडानी ‘ के नये नवेले ‘ बंसल प्लाजा ‘ के बिल्कुल ताजा सिनेपोलिस थिएटर में ! बताते हैं कि हबीबगंज रेल्वे स्टेशन 1979 में बना था और 2021 में PPP ( पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप ) के तहत बंसल ग्रुप ने इसको 100 करोड़ रुपए खर्च कर के वर्ल्ड क्लास स्टेशन बनाया, इसके बदले में बंसल ग्रुप रानी कमलापति रेल्वे स्टेशन में अरबों रुपयों की मौके की जमीन पर शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, मार्ट , हॉस्पिटल, स्मार्ट पार्किंग बनायेगा या बना रहा है या बना दिया है और जीवन पर्यंत नेता – पूँजीपति के पार्टनरशिप के तहत नोट छापे जायेंगे, आम जनता को उनके ही दिये टैक्स के पैसे से लूटा जाता रहेगा और टेक्स पेयर जनता खुशी खुशी विकास के लूट तंत्र को स्वीकार करती रहेगी I
कभी बंसल प्लाजा को देखते हुए , कभी बंसल वन को निहारते हुए, कभी कनखियों से कमलापति रेलवे स्टेशन को ताकते हुए, बंसल प्लाजा की पार्किंग की स्लिप ले के लिफ्ट से सीधे सिनेपोलिस मल्टीप्लेक्स में 300 रुपए की टिकट ले कर घुसा तो देखा जैसे किसी छोटे मोटे फूड ( शॉपिंग ) प्लाजा में घुस आया हूँ, बड़ी बड़ी स्क्रीन में दिख रहा है कि फलां बिल के फूड का ओर्डर प्रिपेयर हो रहा है, कोई ऑर्डर फलां स्क्रीन की फलां सीट पर इतने मिनट में सर्व हो जायेगा, ऐसा लगा कि फूड ज़ोन के लिये सिनेमा हाल बना दिये गये हैं, सिर्फ भोग भोग .. और उपभोग .. फटी आँखों से देखता हुआ स्क्रीन हाल मे घुसा .. ज्यादातर युवा जोड़ियाँ ( लड़के – लड़की ) चिपक चिपक के बैठे दिख रहे थे और पॉपकॉर्न, कोल्ड ड्रिंक, समोसा, नाचोस, बर्गर आदि एक दूसरे को खिलाये – पिलाये जा रहे थे , क्या सुंदर माहौल था .. संपूर्ण हाल में प्रेम बरस रहा था I
10 – 20 विज्ञापन ‘ पे ले ‘ गये कि करीना कपूर इस ब्रांड के हीरे का नेकलेस पहनती है .. तुम भी पहनो , 80 साल का बे – बाल अमिताभ बच्चन चमेली का तेल बेच रहे हैं और उसके बाद 3 – 4 ट्रेलर झेलने के बाद फिल्म सैयारा शुरू हुई , सजी संवरी कवि हृदय हिरोइन वाणी कोर्ट मे बैठी है शादी करने , किसी ऐसे आदमी से जो उससेे शादी नहीं करना चाहता .. गजब हैं, वाणी का मध्यमवर्गीय पिता , शोषित आदमी, निकला पेट, मुरझाया चेहरा और टिपिकल गृहणी मां, बातूनी, धारणाओं, परंपराओं में जकड़ी धार्मिक ममतामयी माता I वाणी ने प्यार तो किया लेकिन लड़के को समझ नहीं पायी .. बिना समझ का ये कैसा प्यार ? वाणी इस धोखे को सह नहीं पाती और महीनों उभर नहीं पाती .. खैर फिर हीरो कृष कपूर की फिल्म में एंट्री होती है , निठल्ला हीरो लाखों रुपए की मोटर साइकल मे सिगरेट पीते हुए घूमता है , गुंडा स्टाइल में लात – घूंसे चलाते हुए , बिखरे बाल, स्टाइलिश Gen – Z, फोकट का गुस्सा, दिशाहीन युवाओं के प्रतीक हीरो को वीणा से प्यार हो जाता है और वीणा को भी !
इंटरवल होता है, मैं हाल से बाहर आता हूं तो देखता हूं कि जोड़े ही जोड़े , आसपास के कस्बों से आई लड़के लड़कियाँ, बॉलीवुड स्टाइल के सस्ते जूतों के संस्करण, सस्ते जींस, काले टॉप में लड़कियाँ, खुले बाल, एक दूसरे की बाहों मे दुनिया से बेखबर चारों तरफ कृष और वीणा नजर आ रहे थे, बाहर ठेलों में चाउमिन बमुश्किल खाने वाले निठल्ले , 300 रुपए के पॉपकॉर्न ले रहे थे , बाहर 5 रुपए की कट चाय के शौकीन कृष अपनी वीणा के लिये 150 रुपए की कोल्ड ड्रिंक ले रहे थे सिर्फ इस आस में कि देसी वीणा से अनीता पड्डा की तरह शायद ‘ फ्रेंच किस ‘ मिल जाये और देसी वीणायें इस आस में थी कि ये मेरा लल्लू भी अहान पांडे की तरह दुनिया छोड़ के मेरे पास आ जायेगा I
हम सब फिल्मों को ही तो जी रहे हैं, वैसे ही कपड़े, वैसे ही केश, वैसा ही प्रेम, वैसी ही शादियाँ, वैसा ही पागल लड़के – लड़कियाँ, लड़के, प्रेमिकाओं में आलिया भट्ट या दीपिका ढूंढ रहे हैं और लड़कियाँ प्रेमियों में टाइगर श्रॉफ, रणबीर कपूर ढूंढ रही हैं , ना जीवन की कोई समझ है, ना बोध है, बस जीवन इतना ही जाना है कि एक लड़का पकड़ लो, एक लड़की पकड़ लो और फिर कहीं गल्ले पर बैठ कर जीवन खराब करना है, या नौकरी कर के किसी की गुलामी करना है और अपने ही जैसी दो तीन देह पैदा करके जीवन में अनंत बंधन पाल लेना है .. आम संसारी का यही जीवन है I
वीणा गीत लिखती है और कृष गाता है .. दिल को छू देने वाली स्क्रिप्ट है, शराबी , फटेहाल बाप का बिगडैल बेटा समुंदर किनारे आलीशान बंगले में रहता है, वीणा के साथ रोमांस करता है, अपनी प्रेमिका के साथ हम बिस्तर होता है, इतने में पटकथा में अचानक ट्विस्ट आता है हीरोइन को गजनी टाइप बीमारी हो जाती है, ऐसी अजीब बीमारी की जो धोखेबाज प्रेमी को तो याद रखती है लेकिन अपने बावले प्रेमी कृष को भूल जाती है और फिर अचानक गायब हो जाती है, पागल प्रेमी पागलों जैसे वीणा को ढूंढता है और ढूंढ भी लेता है I भटके हुए युवाओं के लिये यथार्थ से बहुत दूर भटकती हुई फिल्म है, नासमझ लोगोँ के लिये बनाई हुई फिल्म से कुछ भी समझदारी की उम्मीद करना बेमानी है .. हिंदुस्तानी युवा काँवड यात्रा में व्यस्त है, महाशिवरात्रि के डी जे में व्यस्त हैं , मस्जिद के नीचे मन्दिर ढूंढने में व्यस्त है और सैयारा जैसी ऊलजलूल फिल्म देखने में व्यस्त है I
