भारत के खेल मंत्री मनसुख मांडविया ने हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कोलकाता के प्रसिद्ध फुटबॉल क्लब मोहन बागान (Mohun Bagan) का नाम गलत उच्चारण करके ‘मोहन बैंगन’ कह दिया, ईस्ट बंगाल को ईस्ट बैंगन बोल दिया ! माफ कीजिये मंत्री जी बोल नहीं रहे थे, पढ़ रहे थे ! शर्म आना चाहिए हिंदुस्तान की जनता को कि एक ऐसे नेता को उसने केंद्रीय मंत्री बना दिया जिसे पढ़ना तक नहीं आता ? ये क्या खेलों के लिये कोई योजना बनाएंगे ? उधर दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता तो बेअक्ली के अनेकों बयान दे चुकी हैं , अभी ताजा बयान ने तो उनकी मूर्खता के सारे कीर्तिमानों को ध्वस्त कर के रख दिया है, उन्होंने बयान दिया कि भगत सिंह , राजगुरु , सुखदेव ने बहरी कांग्रेस से क्षुब्ध होकर असेंबली में बम फोड़ा था ? हिंदुस्तान का एक एक बच्चा जानता है कि गुलाम हिंदुस्तान में 1929 में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेंबली में बम फोड़ा था ! विपक्षियों के विरोध का ऐसा जुनून कि रेखा गुप्ता शायद अपना मानसिक संतुलन तक खो बैठी हैं ? रेखा गुप्ता का इतिहास ज्ञान ही शुन्य नहीं है , बल्कि सामान्य ज्ञान भी चिंतनीय है !
आजादी के समय 1951 में भारत की साक्षरता दर मात्र 28% थी और वर्तमान में लगभग 80% है लेकिन हिंदुस्तान का दुर्भाग्य है कि जैसे जैसे भारत के लोग साक्षर हो रहे हैं वैसे वैसे और भी घटिया नेताओं को चुन रहे हैं, पहले के लोगों में भले ही किताबी ज्ञान नहीं था लेकिन सांसारिक ज्ञान तो पर्याप्त था लेकिन विडंबना ये है कि अब ना तो लोगों में आंतरिक ज्ञान है, ना ही पुस्तकों का ज्ञान है ना ही कोई भौतिक ज्ञान है, अभी तो जनता व्हाट्स एप, इंस्टाग्राम और फेसबुक ज्ञान से लबरेज है , भारत में मूढ़ लोग बहुतायत में पाये जा रहे हैं, जिनके पास इंसान होने की चेतना भी नहीं, वो अपने नेता को चुनने की चेतना कहां से लायेगा ? भारत में जो भी राजनीतिक नेता हुए हैं वो जनता का नेतृत्व नहीं करते वो जनता के पीछे पीछे पीछे चलते हैं और देश के लिये बदकिस्मती की बात ये है कि नेता जिनके पीछे पीछे चलते हैं , वो सबसे ज्यादा मूर्ख और अनपढ़ हैं और मूर्ख मतदाता किसको चुनेगा ?
एक केंद्रीय खेल मंत्री को मोहन बागान फुटबॉल क्लब का नाम तक नहीं मालूम ? 1889 में संस्थापित मोहन बागान फुटबॉल क्लब को हिंदुस्तान का बच्चा बच्चा जानता है सिवाय देश के खेल मंत्री के ? इस देश की लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था और सरकारी तंत्र को असाक्षर नेता और भृष्ट नौकर शाह कभी नहीं सुधार सकते ! सुधरना तो जनता को ही होगा ! जिस दिन जनता ने बोध, विवेक, समझ से नेताओं को चुनना शुरू कर दिया उस दिन मंत्री, मुख्य मंत्री, प्रधान मंत्री , चीफ सेक्रेटरी, प्रिंसिपल सेक्रेटरी, कमीश्नर, कलेक्टर सब सुधर जायेंगे ! सारी व्यवस्था चाक चौबंद हो जायेगी !
अमेरिका, चीन क्यों ओलंपिक में 40 – 40 स्वर्ण पदक ले के विश्व के सरताज बने बैठे हैं ? और हिंदुस्तान जीरो स्वर्ण ले के 71वें नंबर पर क्यों है ? क्यों चीन में 70000 खेल मैदान हैं और भारत में सिर्फ 2000 उसमें भी ज्यादातर क्रिकेट के मैदान हैं ! विश्व की टॉप 100 यूनिवर्सिटी में भारत की एक भी यूनिवर्सिटी क्यों नहीं हैं ? दिल्ली विश्व का सबसे गंदा और प्रदूषित शहर क्यों है ? क्योंकि बेहोश जनता भद्दे किस्म के नेताओ को देश की बागडोर सौंप देती है कभी जाति के नाम पर, कभी धर्म के नाम पर , कभी 100 – 200 रुपए के लिये, कभी झूठे वादों के चलते !
जिस दिन जनता जागृत हो जायेगी उस दिन सब बदल जायेगा, जब तक मन में भ्रांतियां हैं, मान्यताएँ हैं, धारणाये हैं, तब तक जनता सही नेता कैसे चुन पायेगी ? कोई जगह शिक्षित क्यों हैं, कोई जगह पिछड़ी हुई क्यों है , कोई जगह व्यर्थ किस्म के नेता क्यों चुनती है ? कोई जगह जनता अंधविश्वास में इतनी लिप्त क्यों है ? इसलिए तो जन जागृति की आवश्यकता है, आदमी का मन प्रकाशित होगा तो जमीन पर रौनक छा जायेगी ! और अगर मन में ही अंधेरा है तो फिर खंडहर भवन, खस्ता हाल और टूटते पुल, जर्जर स्कूल, लापता अस्पताल यही देश की हालत रहेगी ! देश और राज्यों की इस खस्ताहाल हालत का जिम्मेदार है आदमी का आंतरिक अंधेरा ! जब तक लोगों के अंदर अंधविश्वास है तब तक स्कूल, अस्पताल, सड़कें, बिजली, पानी की हालत खराब ही रहेगी ! यही कारण है कि आदमी इसी तरह के भद्दे किस्म के नेता चुनती रहेगी और अगर अच्छे नेता आ भी जायेंगे तो मूढ़ जनता उनको काम नहीं करने देगी !
शिक्षित और रोशन मन की जनता ही इस देश को प्रगति के पथ पर अग्रसर कर सकती है !
