भारतीय पत्रकारिता जगत के बुद्धिजीवी और क्रांतिकारी पत्रकार रजत शर्मा की बेटी की भव्य शादी मुंबई और दिल्ली में संपन्न हुई, रजत शर्मा ने पिछले एक दशक से लगातार पत्रकारिता का धर्म निभाते हुए जनता के पक्ष में सत्ताधारियों से ऐसे ऐसे चुभते और सुलगते सवाल किये हैं कि भारत की जनता ने उन्हें बेइंतिहा प्यार, मान सम्मान और अथाह धन – दौलत से नवाजा दिया है ! सच्चाई तो ये है कि पत्रकार , निःसहाय जनता और सत्ताधारियों के बीच की धुरी होता है , पत्रकार का काम जनता की तकलीफों जो सरकार तक पहुँचाना होता है और सरकार की नाकामियों को जनता तक लाना होता है !
रजत शर्मा ने इसके उलट किया , उसने जनता की तकलीफों पर बोलना और दिखाना बंद कर दिया और साथ ही सत्ता और सरकार की नाकामी पर पर्दा डालने की सारी तकरीबें खोज निकाली, रजत शर्मा ने सत्ता की चाटुकारिता के सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले और चापलूसी के नये आयाम स्थापित किये हैं और इसके लिये अवश्य ही उन्होंने अपने आत्म सम्मान और सिद्धांतों के साथ समझौता किया होगा और उसका इनाम और परिणाम दिख भी रहा है, उनकी बेटी की करोड़ों रुपए की अलौकिक शादी में सत्ताधारियों, विभिन्न पार्टी के राजनेताओं, कलाकारों, कॉमेडियन, पूंजीपतियों, धार्मिक गुरुओं, नौकर शाहों और मीडिया के दिग्गजों का अदभुद जमावड़ा दिखा ! शादी की भव्यता को देख के ऐसा लग रहा है जैसे किसी ऊँचे दर्जे के व्यापारी ( डीलर ) के यहां जश्न मनाया जा रहा हो , भारत की 145 करोड़ जनता को कुछ चंद लोगों की मिलीभगत ने ही तो गुलाम बना रखा है और वो सारे चंद लोग रजत शर्मा की बेटी की शादी में मौजूद थे !
भारत की अशिक्षित, अंधविश्वासी, धर्मभीरू, नफरत और जाति प्रथा में उलझी जनता को गिनती के स्वार्थपरायण राजनेताओं , पाखंडी धर्म गुरुओं, भ्रष्ट नौकरशाहों , लालची पूंजीपतियों और बिकी हुई मीडिया की मिलीभगत ने लोकतंत्र का गला घोटते हुए स्थायी रूप से जनता को गुलाम बनाने के सारे इंतेज़ाम कर लिये हैं , आज हिंदुस्तान की जनता जीवन यापन की बुनियादी जरूरत की चीजों के लिये तरस रही है लेकिन तथाकथित जनसेवक और जनता के हितों के पहरेदार मीडिया के बिके हुए मालिक जनता के पैसों को लूटकर कमाए हुए पैसों से विलासिता और भव्यता का प्रदर्शन कर रहे हैं ? देश की वर्तमान परिस्थितियों से अंदाज लगाया जा सकता है कि हिंदुस्तानियों को मुगल, तुर्की, मंगोल, अफगानी, ब्रिटिश, फ्रांसीसी, डच, पूर्तगालियों ने 1000 साल तक कैसे गुलाम बनाये रखा होगा ? बस फर्क इतना है कि गोरे अंग्रेजो की जगह कालों और भूरों ने ले ली है , आज भी जनता गुलाम ही तो है ?
मीडिया टाइकून ( मीडिया उद्योग का शक्तिशाली व्यवसायी ) रजत शर्मा विशुद्ध व्यवसायी हैं, पत्रकारिता को उन्होंने कॉर्पोरेट कल्चर में बदल दिया है, लाभ – हानि के कुचक्र में फंसा दिया है ! जाने कितने ही मीडिया हाउस की रीढ़ की हड्डी पैसों के लालच में लुप्त हो गयी है और वर्तमान में अधिकांश हिंदुस्तानी मीडिया के पास ना कोई नीति है, ना जिम्मेदारी है, ना कोई नैतिकता है ना ही कोई इंसानियत बची है और ना ही कमजोरों और निःसहाय जनता के लिए कोई संवेदना बची है, पूँजीपति मीडिया जंगल के एक चेतनाहीन जानवर की तरह आचरण कर रहा है ,जैसे पशु को भूख लगती है तो वो निरीह हिरण के माँस से अपनी भूख मिटाता है ! फर्क इतना है नुकीले दांतों की जगह माइक ने ले ली है और पैने नाखूनों की जगह वो कुतर्क हैं जो वो दिन रात अपने चैनल में चीखते – चिल्लाते रहते हैं, माइक के पीछे बैठा इंसान जानवर से बदतर हो चुका है !
पैसा ही कमाना है या जमीर का सौदा ही करना है तो सैकड़ों करोड़ों रुपए से तो अनेकों लाभदायक व्यवसाय करे जा सकते हैं जिसमें ना तो चेतना की जरूरत होती और ना ही इंसानियत की ? कसाईखाना या बूचड़खाना खोला जा सकता है या थाईलैंड की तर्ज पर हाई फाई चकला खाना खोला जा सकता है या मुखर्जी नगर में 50 क्लासरूम के साथ कोचिंग सेंटर खोला जा सकता है या कोई इंटरनेशनल पब्लिक स्कूल खोला जा सकता है या कोई मल्टी स्पेशलिटी हॉस्पिटल खोला जा सकता है या गलगोटिया यूनिवर्सिटी जैसे शिक्षा संस्थान खोले जा सकते हैं ? लेकिन जड़ चेतना के साथ व्यापारिक हितों के लिये मीडिया हाउस खोलना एक लोकतांत्रिक देश में देश को धोख़ा देना जैसा है, विशेषकर गरीब और अशिक्षित देश में तो गुनाह है !
देश को आजादी दिलाने में सत्य के साथ खड़े पत्रकारों का बहुत योगदान रहा ! बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, गणेश शंकर विद्यार्थी , राजा राम मोहन राय, तारक नाथ दास और अब्दुल कलाम आजाद जैसे अनेकों पत्रकारों अंग्रेजों का जीना हराम कर रखा था और केसरी’ (तिलक), ‘यंग इंडिया’ और ‘हरिजन’ (गांधी), ‘अमृत बाजार पत्रिका’ जैसे अखबारों ने अंग्रेजों के अत्याचारों का पर्दाफाश किया था ! आज भी इतिहास में सच्चे पत्रकारों का नाम दर्ज है लेकिन कई पत्रकार तो अंग्रेजों की गोदी में भी बैठे होंगे क्या आज कोई उन गद्दार पत्रकारों का नामलेवा है ?
पत्रकारिता एक सोच है जो गुलाम देश को आजादी दिलवा सकती है या आजाद देश को गुलामी की जंजीरों में कैद कर सकती है ! जनता को भी समझना होगा कि बिके हुए मीडिया हाउस उसी लोकतांत्रिक पेड़ पर बैठे हैं जिस पेड़ पर निशक्त जनता विराजमान है, पूंजीपति मीडिया की गुलामी के चलते लोकतांत्रिक पेड़ की जड़ें खोखली हो रही है, इसके पहले कि जड़ नष्ट हो जाये और पेड़ गिर जाये , जनता को बिके हुए चैनलों का बहिष्कार करना चाहिए, इनकी ताकत यही है कि आप इनके चैंनलों को देख रहे हो I
