मैंने एक पूँजीपति मीडिया के चैनल में बंधुआ मजदूर पत्रकार बनने के लिये आवेदन किया, कुछ दिन बाद मेरे पास फरमान आया कि फलां तारीख को साक्षात्कार देने आईये ! मैंने सपने संजोते हुए लोहे की पेटी से गुडमुड शादी का 3 पीस सूट निकाला और गली के नुक्कड़ पर स्त्री करने वाले को सूट सौंपते हुए बोला कि इसकी सल निकाल दे और हां 500 रुपए उधार दे दे, नौकरी लगते ही दे दूंगा I स्वतंत्र पत्रकारिता करते हुए मैंने पेड़ के नीचे दुकानदारी सजाये बैठे गरीब प्रेस वाले की पुलिस और नगर निगम से सेटिंग करा रखी थी, बहुत मानता था बेचारा !
सूट लेकर घर की तरफ आते आते मेरे अरमान कुलांचे मार रहे थे, ब्रांडेड माइक ID होगी, एक समर्पित कैमरा मेन होगा, SLR कैमरा होगा, सब तरफ लोग मुझे सलाम कर रहे होंगे, कंपनी की ब्रांडेड गाड़ी होगी, कार के ऊपर छतरी होगी, विधानसभा और संसद का VIP पास होगा, मंत्रालय में लोग जो कल तक हिकारत कि नजरों से देख रहे होते थे वो सलाम ठोक रहे होंगे, मंत्री, मुख्य सचिव, अतिरिक्त मुख्य सचिव मुझे चाय पानी पर आमंत्रित करने के लिये आतुर होंगे, सब मुझे साक्षात्कार देने के लिये उतावले होंगे, मंत्रीयों के जो OSD, PA मेरा फोन नहीं उठाते थे वो मुझे संदेशे भेज रहे होंगे कि सोनी जी क्या नाराजगी है ? बहुत दिनों से हमारे माननीय जी पर आपकी नजरें इनायत नहीं हुई, विभाग में नवाचारों की झड़ी लगी हुई है आइये कभी मंत्री जी की मेहनत को जन जन तक पहुंचाइये !
जब मेरा ब्रांडेड चैनल किसी 5 स्टार होटल में लाइव कार्यक्रम करेगा तो माननीयों, नौकर शाहों, नेताओं , महाबलियों का मेला लगा होगा और फॉर्च्युनर में चलने वाले नेताओं के गुर्गे मुझे सलाम कर रहे होंगे , मैं भी बड़े बड़े कलफ लगे कुर्ते – पजामा और शानदार नेहरू जैकेट पहने जनसेवकों से हाय – हैलो कर रहा हूँगा, ये सब हसीन नजारे देखते देखते घर कब पहुँच गया पता ही नहीं चला ! तंद्रा जब टूटी जब पत्नि बोली आज प्याज रोटी खा लेना, सब्जी नहीं है घर में, मैंने कहा मेरी भाग्यवान अपने मुफलिसी के दिन खत्म हुए समझो, ये ले 200 रुपए और अमृतसरी छोले कुलचे मंगा ले, दोनों खायेंगे मिल बैठ के ! पत्नि कभी मुझे देखे और फिर मेरे झोले को देखते हुए बोली – ” ठीक तो हो ? ” ! बच्चे की फीस दें या छोले – कुलचे खाएं ?
सूट पहन के, धूल में सने हुए जूते पैरों में डाल के सीना तान के खटारा गाड़ी में निकल कर इंटरव्यू देने निकल पड़ा, हेलमेट के अंदर दुःस्वप्न आने लगे कि होली दिवाली पर लाइन में लग के कुछ रुपए लेने के शर्मनाक दिनों का अंत हुआ, होली – दिवाली पर एक डिब्बे मिठाई के लिये लड़ना अब खत्म हुआ, प्रेस वार्ता में खाने के लिये जद्दोजहद करने का दौर अब समाप्त हुआ, रोज प्रेस वार्ता के आमंत्रण की बाट जोहना और पत्रकार दोस्तों से पूछना की भोजन की व्यवस्था है या कोई गिफ्ट है ? और हां प्रेस कांफ्रेंस बेग के लिये जी जान लगा देने जैसे संघर्षों की इति हुई I इन्ही हसीन सपनों को सोचते हुए पूँजीपति मीडिया हाउस की बड़ी सी इमारत के सामने पहुँच गया, हेलमेट उतारा, झोला कंधे पर डाला और घुस गया, अंदर एक विशालकाय रिसेप्शन देख के मेरी हस्ती तक डगमगा गयी , एक पत्रकार का अहंकार जैसे तार तार हो गया !
अभी तक तो मोहल्ले के लोगों के छोटे मोटे झगड़ों और समस्याओं का लोकल पुलिस थाने या तहसील कार्यालय से निपटारा करवा देता था और सीना तान के झूठे अहंकार में स्कूटर में प्रेस लिखवा के घूमा करता था लेकिन यहां तो दो सुंदरियाँ रिसेप्शन पर काले सूट, लाल टाई और लाल लिपस्टिक धारण किये बैठी थीं, एक बोली, Hello Sir , how can I help you ? मैंने कंपकपाते हुए हांथों से झोले से इंटरव्यू लेटर निकल के दिया और हकलाते हुए बोला जी साक्षात्कार देने आया था, वो बोली आप पांचवे फ्लोर पर जाइये और उसने कंप्यूटर में कुछ देख के इंटरव्यू लेटर पर 129 नंबर लिख के मुझे सौंप दिया I लिफ्ट में जाते हुए मैं कभी इंटरव्यू लेटर को देख रहा था कभी उस पर लिखे नंबर को देख रहा था, तभी लिफ्ट से आवाज आई, Now you have reached on fifth floor !
