एक सप्ताह पहले सुबह सुबह पत्नि चिड़चिड़ाते हुए बोली कि दिन भर मोबाइल लेकर बैठे रहते हो, पत्रकार बने फिरते हो लेकिन ना तो तुम्हें दुनिया की खबर है ना घर की .. आग लगे ऐसी पत्रकारिता को ? मैंने पूछा कि क्या हुआ ? ऑफिस में बॉस जीना मुहाल किये है l और घर पर तुम , ऑफिस में बॉस कुछ लिखने नहीं देता और तुम हो कि घर में बोलने नहीं देतीं , बॉस बोलता है सत्ता के बारे में कुछ भी सच नहीं लिखना है और विपक्ष के बारे में सिर्फ झूठ का प्रचार – प्रसार करना है ? अब बॉस कह रहा है LPG सिलिंडर नहीं मिलने की कहानी में विपक्ष के एंगल को घुसेड़ो, मैं उसी उधेड़बुन में हूं और तुम हो कि मेरी प्रबुद्ध पत्रकारिता को चुनौती दे रही हो ?
पत्नि बोली जिसे ये नहीं मालूम कि घर में LPG खत्म हो रही है और बाजार में सिलिंडर नही मिल रहा है, जिसे दुनिया के बारे में रत्ती भर खबर नहीं ,उसका तो भगवान भी साथ नहीं दे सकता ? तभी तो खुद भी फटीचर जिंदगी जी रहे हो और मेरी जिंदगी भी फटेहाल बना दी है, जिंदगी बीत गयी कभी किसी अच्छे होटल में मुझे खाना खिलाने की तो औकात तुम्हारी बन नहीं पायी , तुम जरूर कुत्तों की तरह जीभ निकाल के पत्रकार वार्ता मे बोटी खा आते हो I इस बात पर मुझे गुस्सा आ गया , मैंने कहा कि औकात में बात करो, मेहनत की खाता हूं ! पत्नि बोली मेरा मुंह ना खिलवाओ, क्या मेहनत करते हो ? एक सिलिंडर का जुगाड़ तो कर नही पा रहे हो ? दिन रात पहचान बनाते घूमते रहते हो, कभी इसके पीछे बैठ के कभी उसकी पीठ पे लद के, आग लगे ऐसी पहचान को जो संकट के समय एक सिलिंडर तक नहीं मिल पा रहा है एक वरिष्ठ पत्रकार को, लानत है तुम्हारी पत्रकारिता को, अरे तुमने खाद्य मंत्री के खूब कसीदे गढ़े थे, एक सिलिंडर ही भरवा लो मंत्री जी से ?
इससे ज्यादा सत्य सुनने की मेरी औकात नहीं नहीं थी, एक दो पत्रकार मित्रों को फोन लगाया ताकि एक चार पहिया का जुगाड़ हो जाये लेकिन झक मार के अपनी ही पुराने जमाने की खटारा कार निकाली, सिलिंडर रखा और निकल पड़ा, पहले HP गैस एजेंसी गया, भीड़ देख के मुझे किसी थोपे हुए नेता की सभा में भुगतान कर के बुलाये हुए श्रोताओं की याद आ गयी, बहुत भीड़ थी, दो लाइन लगी थी , एक काउंटर पर गैस एजेंसी का कूपन दे के गैस एजेंसी की सील लगवानी थी, फिर वो कूपन और पैसे गैस की टंकी के पास खड़े देवता स्वरूप सज्जन को देकर टंकी लेनी थी , मैं भी मोदी जी का नाम ले के अंतहीन लाइन के दूसरे सिरे पर लग गया I
भरी धूप में 12 बजे मेरा नम्बर आया तो प्रभु स्वरूप काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने कहा कि ऑनलाइन बुकिंग की थी ? मैंने कहा – हां, उसने कंस्यूमर नंबर पूछा और बोला बुकिंग के समय SMS आया होगा, मैंने कहा ऑनलाइन बुकिंग में SMS नहीं आता बल्कि बुकिंग कोड मिलता है, वो बोला कि वही दे दीजिये, मैने कहा कि कौन नोट करता 8 डिजिट का कोड ? मैंने कहा कि बुकिंग मेरी हो गयी है ना ? तो आप क्यों ये सब नाटक कर रहे हो ? बुकिंग कोड की तो जब जरूरत होती है जब आपके कंप्यूटर में बुकिंग दिखायी ना दे रही हो ? काउंटर पर बैठा आदमी मुझे झिड़कते हुए बोला कि आप मैनेजर साहब से बात कर लो ? मैं समझ गया कि मनुष्य का वही पुराना कालाबाजारी का खेल चालू हो गया है ! मरता क्या ना करता मैं मैनेजर से मिलने वाली लाइन में लग गया , लाइन में लगे एक हैरान परेशान शख्स बोले देखो क्या जमाना आ गया है, इंसानियत ही नहीं बची है, 900 रुपए के सिलिंडर के 2000 रुपए मांग रहे हैं ? जिसकी ऑनलाइन बुकिंग है उसको भी येन केन प्रकरेण सिलिंडर नहीं देने का बहाना बना रहे हैं ! मैंने उस नादान भले मानुस को कहा कि तुम्हे ये गलतफहमी कैसे हो गयी की इंसानियत कभी बची थी , इतिहास उठा लो जब भी कभी युद्ध हुए हैं या कोई भी आपदा आई हैं तो समाज के एक वर्ग ने खूब पैसा कमाया हैं, आदमी के शरीर के अंदर अहंकार बैठा है जो हमे ( शरीर ) को संचालित करता है, अहंकार अपने फायदे के लिये लाशों के बीच भी मुनाफा खोरी करने से बाज नहीं आता , ये तो सिर्फ सिलिंडर की छोटी सी बात है ?
कोरोना का संकट याद है ना, पूंजीपतियों ने, अस्पतालों ने , नेताओं ने, अधिकारियों ने, उद्योगों ने खूब पैसा पीटा था, लाखों लोग मारे भी गये ? शुरू शुरू में तो सामाजिक संस्थाओं ने, गैर सरकारी संस्थाओं ने खूब निस्वार्थ सेवा की लेकिन दूसरे दौर में तो लूटखसोट का बेलगाम दौर चला, किस इंसानियत की बात करते हो भाई साहब ? अहंकार , जमीन जायदाद के लिये सगे भाई – बहनों को जमींदोज कर देता है, अहंकार अपने फायदे के लिये लाश के तक गहने नोंच लेता है, मैंने कहा भाईसाहब अपने दिमाग से गलतफहमी निकाल दो कि आदमी अच्छा होता है ,हम जंगल से ही निकल के आये हैं और जंगल मे ऊंचे मूल्य नहीं चलते ! जंगल में तो पेड़ पर दीमक लगेगी, हिरण को शेर मारेगा, जंगल में सत्य नहीं बल और धूर्तता चलती है ! जानवर के नाखून होते हैं और इंसान ने जेब में रिवॉल्वर रख ली है, कोई फर्क नहीं है पशु और इंसान में , बस जानवर दिखायी दे जाता है और इंसान ने अपनी पशुता को सूट, कोट, टाई के पीछे छुपा लिया है ? इस दुनिया में 2 तरह के लोग हैं या तो बुरे बुरे या अच्छे बुरे, होते तो सभी बुरे हैं, एक बुरा आदमी है जिसको सब जानते हैं कि बुरा है और दूसरा आदमी भी बुरा ही है लेकिन उसने अच्छाई का नकाब ओढ़ रखा है I
इंसानियत तो दूर बैठ के तमाशा देख रही है, मुनाफा खोरी, लूट खसोट, आपदा में अवसर, ये सब पशुता की निशानी है, अहंकार की निशानी है, मेरा पैसा, मेरा ओहदा, मेरी इज्जत, मेरा कर्तव्य, मेरा धर्म, मेरी जमीन , मेरा घर, मेरी जात , ये जो मैं ( अहंकार ) है ना, यही तो सारी समस्या की जड़ है, ये ना हो तो रोज 25 लड़कियाँ बच जाएं जो दहेज के लिये बलि चढ़ा दी जाती हैं, ये ना हो तो रोज 100 महिलाएं बलात्कार का शिकार होने से बच जाएं ? LPG सिलिंडर हो या ऑक्सीजन का सिलिंडर हो, जब जब आपदा आयेगी , आदमी इनकी मुनाफाखोरी करेगा क्योंकि अहंकार नामक जानवर अपने फायदे के लिये आदमी से वो सारे काम करायेगा जिससे अहंकार को फायदा हो I
