बंगलौर के रीयल एस्टेट व्यवसायी डॉ सी जे राय ने खुद को गोली मार ली और अपने 10000 करोड़ रुपए के विशालकाय कॉन्फ़िडेंट ग्रुप को अत्यंत हृदयविदारक रूप से हमेशा के लिये अलविदा कह दिया ! डॉ सी जे राय के पास तथाकथित सुख, मौज मस्ती के, विलासिता और अय्याशी के सारे साधन उपलब्ध थे, महंगी महंगी सैकड़ों आयातित गाडियाँ, प्राइवेट जेट, दुबई, अमेरिका में विशालकाय कोठियाँ I बाहर बाहर वैभव, चकाचौन्ध से भरी जिंदगी और सुख से सराबोर जीवन जी रहे थे डॉ सी जे राय लेकिन अंदर शमशान दहक रहा था, अंदर ऐसा दुख था, खालीपन था, डर, भय था जिसको उनके वैभवपूर्ण और भौतिक भोग विलास भरा जीवन भी पाट नहीं सका ! अय्याशी, पैसा भले ही दुनिया को प्रभावित कर ले लेकिन आंतरिक बेचैनी, अशांति , भय डर तो ज्ञान, सत्य और ईमानदारी से आती है, असली विलासिता, वैभव तो जीवन को जानने से आती है .. भोगने से नहीं I
अय्याशी, सुख वैभव और असीम ताकत तो रावण के पास भी थी लेकिन फिर भी राजपाट छोड़ चुके जंगल जंगल भटकते श्री राम से कैसे पराजित हो गया ? क्योंकि श्री राम के पास मर्यादित आचरण था, ईमानदारी थी, प्रेम था, गंभीरता थी, बोध था, क्या श्रीराम दुनिया का हर सुख नहीं भोग सकते थे ? विलासिता पूर्ण जीवन नहीं जी सकते थे ? श्री राम ने तो पिता के वचनों का मान रखने के लिये सिहांसन तक त्याग दिया और वर्तमान समय में तो बेटा ही संपत्ति के लिये अपने ही बाप का गला काट दे ? श्रीराम तो सोने की लंका जीतने के बाद पूरी लंका विभीषण को सौंप आये लेकिन आज तो 2 ग्राम सोने के लिए भाई – भाई एक दूसरे के दुश्मन बन गये हैं ? क्योंकि आज के दौर में हमने सुख को ही आनंद पाने का मार्ग बना लिया है, जिसके पास जितने सुख भोगने के साधन हैं हमने उसे ही सुखी मान लिया है ? आज जीवन का सिर्फ एक ही उद्दैश्य है सुख पाना और सुख पाने का मार्ग बना लिया है भोगने से, अय्याशी से और मौज से ?
भगवान ने हमे दो आँख, दो कान, दो हाथ, मुंह, जीभ, पेट दिया है और हम हर अंग प्रत्यंग से दुनिया को भोग लेना चाहते हैं , बाजार में निकलते हैं तो मिठाई की दुकान भी पड़ती है, कपड़े की दुकान भी मिलती है, दारू की दुकान भी नजर आती है, मल्टीप्लेक्स भी पड़ता है और हम सब कुछ भोग लेना चाहते हैं यहां तक की हमने अपने सुख और भोग के लिये मुर्गा, बकरा, भैंस, गाय, सुअर को भी नहीं छोड़ा है I सुख के लिये पहाड़, हवा, पर्यावरण को भी हम भोग भोग के दूषित कर चुके है , हम अपनी ही जिंदगी के दुश्मन बन गए हैं, सुख, मौज मस्ती ही हमारे जीवन का आदर्श बन गया है I सुख भोगने से और अमीरी से शांति नही मिल सकती अगर ऐसा होता तो महावीर और बुद्ध विलासिता का जीवन नहीं त्यागते ? कैफे कॉफी डे के फाउंडर वी जी सिद्धार्थ याद हैं आपको ? 10000 करोड़ से ज्यादा का सम्राज्य था उनका , सैकड़ों कैफे कॉफी डे के आउटलेट थे उनके देश में लेकिन अंदर से खोखले थे और उन्होंने अपनी जीवन लीला खत्म कर ली थी नदी में कूद के ? कितने ही धन लोलुप जेल के सींखचों के पीछे सड़ रहे हैं या विदेशों में भाग के नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं I
बुद्ध कहते हैं मनुष्य का जीवन एक दुख है और दुख दूर करने के लिये ही हम सुख की तरफ भागते हैं, सुख और भोगवाद को ही हमने दुख दूर करने का इलाज बना रखा है लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है , आध्यात्म कहता है कि दुख दूर करने का एकमात्र उपाय है दुख से मुक्ति ना कि सुख, मौज मस्ती, उत्सव ? मुश्किल ये है कि डॉ सी जे राय की विलासिता तो दिख जाती है वीडियो और फोटो के माध्यम से लेकिन कोई ऐसा कैमरा बना है क्या जो डॉ सी जे राय की अंदरूनी बेचैनी, क्षोभ को दिखा पाता ? कोई किसी अमीरजादे की 200 करोड़ की शादी की भव्यता तो दिखा सकता है लेकिन क्या उस दिखावे के पीछे के अमीरजादे के भीतर बैठे शमशान को दिखा सकता है ? यही कारण है कि हम दिखावे के मायाजाल में फंस के दुख के चक्रव्यूह मे फंस जाते हैं और अपार पीड़ा झेलते हैं I
अगर अय्याशी से तुम्हारे दुख दूर होते हैं तो जरूर करिये लेकिन हमारे संत मुनि कह गये हैं कि ऐसा बिलकुल नहीं है ! श्री कृष्ण निष्काम कर्म का विचार हमे दे के गये हैं .. हमारे वेदांत और उपनिषद कहते हैं जीवन को जानना है और जीवन समझ से जीना है I जीवन का उद्दैश्य सिर्फ भौतिक चीजों को पाना ही नही हो सकता बल्कि सदियों से चली आ रही मान्यताओं और धारणाओं को हटाना है, जो कचरा समाज ने तुम्हारे दिलो दिमाग में बैठा रखा है उसको हटाना ही मनुष्य जीवन का एकमात्र लक्ष्य है I जब भी अय्याशी, विलासिता पूर्ण जीवन जीते किसी को देखो तो उज्जैन के राजा भृतहरि की कहानी को याद रखना, जो कि अय्याश थे और उन्होंने अय्याशी के दौर में ‘ शृंगार शतकम ‘ की रचना की थी जिसमे उन्होंने कामदेव, नारी श्रृंगार की व्याख्या की है और जब अय्याशी के चलते उनके बुरे दिन आये तो उन्होंने ‘ वैराग्य शतकम ‘ की रचना की थी जिसमे उन्होंने सांसारिक भोगों की व्यर्थता पर व्याख्या की है I राजा भृतहरि तो खुशकिस्मत थे कि उन्हें पश्चताप करने का मौका मिला लेकिन डॉ सी जे राय और वी जी सिद्धार्थ जैसे अनगिनत अमीरजादों और भोगवादियों को तो प्रायश्चित करने का मौका भी नहीं मिल पाया I
