भोपाल 2047 की कल्पना, विकास का प्लान नहीं विनाश का षड्यंत्र है !
मुक्ति की उड़ान / भोपाल
भोपाल में एक तरफ हजारों – लाखों पेड़ विकास के नाम पर काटे जा रहे हैं और नेता ” एक पेड़ मां के नाम ” का प्रपंच कर रहे हैं ! भोपाल में ऐसी तपस चिंताजनक है जैसी इस साल पड़ी है लेकिन भोपाल का 2047 तक के विकास का खाका आ गया है, भोपाल में विकास की बयार आयेगी , रहवासी क्षेत्रों मे भी व्यवसायिक गतिविधियों पर ध्यान दिया जायेगा, मेट्रो और मेन रोड के आसपास 15 मंजिल बिल्डिंग की परमीशन दी जायेगी, दर्जनों ग्राम पंचायतों को भी भोपाल के विकास में शामिल किया जायेगा, खेतों और पेडों को बर्बाद कर के बाजार बनाये जायेंगे, रोडें बनाई जायेंगी और शादी गार्डन बनाये जायेंगे , भोपाल की हरियाली, तालाब और पहाड़ों को GDP , बाजारवाद और कथित कृत्रिम विकास के नाम पर बर्बाद कर दी जायेगी , 12000 स्क्वायर फीट का रेस्टोरेंट बनाया जायेगा जिसमें सैकड़ों लोग बैठ सकेंगे, जिसमें बैठ के जानवर खाये जायेंगे , ये विकास का प्लान नहीं विनाश का षड्यंत्र है I पूरी पृथ्वी चीख चीख के कह रही है की तुम गलत जी रहे हो, तुमने जीवन में ख़ुशी और सुख के लिये जो भी मान्यताएँ, धारणाएं बना रखी हैं, वो ही तुम्हारे दुख हैं और तुम्हारे विनाश का कारण हैं I
क्या याद नहीं कि पिछले साल धाराली, किश्तवाड़, कुल्लू, कठुआ मे भारी बारिश से सैकड़ों लोग मर गए और गांव के गांव बह गये, हर साल अतिवृष्टि से, गर्मी से जनता मर रही है, मुंबई – दिल्ली में भारी बारिश से अकाल मौतें हो रही हैं, जनजीवन अस्त व्यस्त हो रहा है ? लेकिन विकास के नाम पर आम जनता इसे एक सामान्य दुर्घटना मान के भूल जाती है , लेकिन ऐसा नहीं है पृथ्वी ये संकेत दे रही है कि तुम्हारे भोग – विलास , विकास और GDP को सुख मानने की प्रवृत्ति तुम्हें कहीं का नहीं छोड़ रही है , ये बादल फटना क्या होता है ? अतिवृष्टि और भीषण गर्मी से जो जनता बेमौत मर रही है, ये तो सिर्फ नमूना है .. जलवायु परिवर्तन से बहुत बड़ी संख्या में जीव – जंतुओ का एक साथ महा विनाश ( mass extinction ) होने वाला है अगर हम इसी तरह विकास के नाम पर नदी, पहाड़ों, जंगलों का विनाश करेंगे तो हम भी नहीं बचेंगे I
आम जनता को समझना होगा कि आदर्श स्थिति में वातावरण में 10 लाख पार्टिकल में से 240 पार्टिकल कार्बन के होने चाहिए , लेकिन वर्तमान स्थिति में कार्बन उत्सर्जन 440 PPM ( particle per million ) हो गया है जो कि चिंताजनक है , इसी वजह से वातावरण गर्म हो रहा है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं, पहाड़ों पर बर्फ पिघल रही है और बर्फ पिघलने से मीथेन और अन्य ग्रीन हाउस गेसेस का उत्सर्जन हो रहा है, यही कारण है कि अतिवृष्टि होती है, प्रकृति का रौद्र रूप देखने को मिल रहा है, मनुष्य, जानवर दर्दनाक मौत के शिकार हो रहे हैं I
जिस देश में 80 करोड़ लोगों के पास खाने को नहीं है वो क्या कार्बन उत्सर्जन करेंगे ? भारत की 90 % जनता कार्बन एमीशन करती ही नहीं हैं , लेकिन 10% अमीरजादे और खासकर 1% पूँजीपति तय लिमिट से 5 – 6 गुना कार्बन एमीशन करते हैं, एक अरबपति या नेता अपने चार्टर प्लेन से 2 घंटे में जितना कार्बन एमीशन करता है उतना तो गरीब आदमी कई जन्मों तक भी नहीं कर सकता, क्लाइमेट चेंज का मुख्य कारण हैं 10% लोगोँ का भोगवाद , मांसाहार, उनके उद्योग, उनके द्वारा खड़ा किया बाजारवाद, उनके द्वारा जंगलों का विनाश, पहाड़ों का नाश I
ये जो भयानक मौतों का तांडव है , वो खेल है नेता, सेठ और बाबा की त्रिकुटी का, सेठों, बाबाजी और नेताओ की मिलीभगत ने पृथ्वी को बर्बाद कर दिया है और अब पृथ्वी ने बदला लेना शुरू कर दिया है I प्रकृति का सारा कहर गरीब जनता को अपना निशाना बना रहा है, वायनाड में कौन मरा ? धराली में क्या कोई अमीरजादा मारा गया ? वो तो नदी, जंगल, पहाड़ों को बर्बाद कर के अपने सुरक्षित महल में अय्याशी कर रहा है I पुराणों में लिखा ही हुआ है कि एक दिन पृथ्वी नष्ट हो जायेगी, वही तो हो रहा है , गंगा किनारे भगदड़ में दर्जनों श्रद्धालुओं की मौत पर एक पाखंडी बाबा ने बोला था ना की महाकुंभ मे भगदड़ से भक्तों को महामोक्ष का प्रसाद मिल गया I
सेठों का लालच , नेताओं का कपट और बाबाओं का पाखंड मिलकर पृथ्वी को नष्ट कर रहे हैं, पर्यावरण को बर्बाद कर रहे हैं ! नेताओं को सत्ता पर तो पूँजीपति ही तो बैठा रहे हैं, पूरा हिंदुस्तान का मीडिया पूँजीपति ही तो चला रहे हैं और आम आदमी अपना आदर्श उन्ही को माने बैठा है जो असल में उनका दुश्मन है ! क्यों आम आदमी पूँजीपति मीडिया देखता है ? जनता को उनको उनके महलों से निकाल कर वहां भेजना चाहिए जहां बादल फट रहे हैं, जहां बाढ़ आ रही है, जहां जंगल काट कर ये सड़क बना रहे हैं, जहां पहाड़ों को काटकर होटल बनाये जा रहे हैं, जहां सुरंगे बनाई जा रही हैं, खनिजों के पाने के लिये पहाड़ों पर धमाके किये जा रहे है I
दिल्ली में भी बादल फटने की आशंका बताई जा रही है सोचिये दिल्ली में क्या होगा ? वो मंजर सोचकर भी रूह कांप उठती है, सोचिये भोपाल में बादल फट गया तो क्या हो सकता है, GDP को ही खुशी, सफलता, सुख का पर्याय मान बैठी जनता का क्या हाल होगा ? क्या GDP से ही किसी देश की तरक्की को नापा जा सकता है ? शिक्षा से नहीं ? मन की शांति से नहीं ? तनाव रहित जिंदगी से नहीं ? सोचियेगा !
