बारामती अपने सपूत के अचानक निधन पर शोक मना रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद घटना उनके गृह क्षेत्र बारामती में घटी, जहां उन्होंने लगातार आठ बार सत्ता हासिल की थी।
अजित पवार को महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री के रूप में रिकॉर्ड पांच बार पद संभालने का गौरव प्राप्त है। उन्होंने महाराष्ट्र की विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ काम किया है।उन्होंने वैचारिक पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर सत्ता में आने के लिए लगातार गठबंधन बनाए I अपनी चचेरी बहन सुप्रिया सुले के खिलाफ अपनी पत्नी को चुनाव जितवाने के लिए संघर्ष किया। अपने बेटे पार्थ पवार के राजनीतिक करियर को आगे बढ़ाने का उनका संघर्ष भी असफल रहा
घोटालों के कारण वो खूब चर्चित रहे, जल संसाधन मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन पर हजारों करोड़ों रुपये के सिंचाई घोटाले में संलिप्तता का आरोप लगा था। दरअसल, भाजपा ने उनके खिलाफ कथित सबूतों से भरी एक बैलगाड़ी निकाली थी, जिसमें 70,000 करोड़ रुपये के सिंचाई घोटाले का दावा किया गया था। अजित पवार पर महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक घोटाले में भी आरोप लगे थे, हाल ही में, उनके बेटे पार्थ पवार पर पुणे में एक भूमि घोटाले में आरोप लगे हैं। कहा जाता है कि अजित पवार ने 10 पुश्तों के लिये पैसा जमा कर लिया था I संपत्ति, कमाई हुई तथाकथित इज्जत और विशालकाय अहंकार को अचानक छोड़ छाड़ कर दर्दनाक हादसे में दुनिया से बिदा हो गये, बचे हुए शरीर को भी जला दिया गया I पैसे की अनंत चाह के कारण उनको कई अनचाहे समझौते करने पड़े, अपने सिद्धांतों से परे जाकर घुटने टेकने पड़े, 24 घंटे के मुख्यमंत्री बनकर पूरे देश में अपना मजाक उड़वाया, जेल जाने का डर दिखा दिखा के अजित पवार का भरपूर शोषण किया गया I
पैसा न अच्छा है, न बुरा; यह एक उपकरण है जिसका उद्देश्य आज़ादी होना चाहिए, बंधन नहीं। जीवन की आवश्यकताओं के लिए धन जरूरी है, लेकिन उससे अधिक की लालसा बंधन बन जाती है। सही समझ के साथ कमाया गया पैसा धर्म हो सकता है, जबकि अंधाधुंध संचय महा-अधर्म। पैसा इसलिए कमाएं ताकि आपको पैसों की चिंता न रहे, न कि इसलिए कि आप पैसों के दास बन जाएं। पहले जीवन का सही उद्देश्य समझें, फिर पैसा कमाएं। पैसे के पीछे भागने से पहले ‘क्यों’ जानना जरूरी है। अपनी ज़रूरतें सीमित रखें। कितना पैसा काफी है, यह तय होना चाहिए, वरना लालच कभी खत्म नहीं होगा।
पैसा दो ज़रूरतें हमारी पूरी करता है। एक है जो कुछ हद तक वास्तविक है, जिसका वास्तव में वर्तमान में उपयोग है और जो दूसरी ज़रूरत है वो बहुत हद तक काल्पनिक है , उदाहरण के लिये आप पचास-हज़ार रुपए महीने के कमाते हैं , उसमें से आप खर्च करते हैं मात्र बीस-हज़ार रुपए, कुल इतना आपका खर्च है, बाकी तीस-हज़ार का आप क्या करते हैं ? वो आपकी एक कल्पना हो सकती है, कि वो आप कभी भविष्य में खर्च करेंगे ? सच पूछा जाए तो आपके जीवन में उस बाकी तीस-हज़ार की कोई उपयोगिता है नहीं ? एक अमेरिकी बिलियनेयर (लखपति) था, जब वो मरा तो उसके खाते में, बैंक खाते में, अरबों डॉलर्स बचे हुए थे ! उसने कहा कि, “एक–एक क्षण जो मैंने इस एक–एक डॉलर को कमाने में लगाया, जो आज मेरी मृत्यु के समय शेष है, वो एक–एक क्षण व्यर्थ गया ? ठीक ऐसा ही जीवन हम जीते हैं ! संत कबीर के यहाँ तो कमाने का बस इतना ही प्रयोजन है कि, “मैं भी भूखा ना रहूँ और साधु भी न भूखा जाए।” कबीर के यहाँ पर संचय जैसी कोई चीज़ नहीं है। बुद्ध ने नाव का उदाहरण लिया है। वो कहते थे कि जैसे जब नाव में पानी भर जाए तो डूबने लगती है तब उलीचना पड़ता है। तो बुद्ध कहते हैं, “उलीचो, अगर जहाँ देखो कि भरने लगा है तो उलीच दो नहीं तो नाव डूबेगी।” समझ रहे हो न इसका अर्थ ? संचय न होने पाए क्योंकि संचय सदा भविष्य के लिए होता है, और जीवन कब है ? वर्तमान में ! क्या कोई भविष्य में साँसें लेकर दिखा सकता है ? जीवन तो अभी है ? लेकिन जो ये सेविंग की मानसिकता होती है, ये तुमको लगातार–लगातार भविष्य में ले जाकर पटक देती है I
आदमी का जो मन है, जो अहंकार है, वो इकट्ठा करने वाला होता है, सिर्फ़ पैसा ही नहीं वो हर चीज़ इकट्ठा करना चाहता है। तुमने बहुत लोगों को देखा होगा कि उनका लोगों से कोई प्रयोजन हो न हो वो अपना एक घेरा, सामाजिक वर्तुल, बहुत बड़ा बना के रखते हैं , न्यू इयर (नया साल) आएगा, दीवाली आएगी, वो पाँच–सौ लोगों को मेल भेजेंगे, भले उन पाँच–सौ लोगों के मरने से भी उन्हें रंच मात्र फर्क ना पड़ता हो।तो ये क्या कर रहे हैं ? ये पैसा नहीं जमा कर रहे, ये रिश्ते जमा कर रहे हैं, ये एक नेटवर्क (तंत्र) जमा कर रहे हैं कि ये किसी दिन काम आएगा। अर्थ बिलकुल वही है, जैसे तुम सोचते हो न कि पैसा किसी दिन काम आएगा, तो ये लोग ‘लोग’ जमा कर रहे हैं कि ये किसी दिन काम आएगा। ऐसों से बच कर रहना, ये तुम्हारा इस्तेमाल करना चाहते हैं बस I
जिसके जीवन में असली उतर आता है न, जिसके जीवन में ये उतर आता है “सत्, चित, आनंद, मुक्ति और प्रेम” – पहले तीन मिला दो तो सच्चिदानंद हो जाता है – उसको फिर बहुत संग्रह-वंग्रह करने की जरूरत महसूस नहीं होती है , उसके लिए रुपया बिलकुल छोटी चीज़ हो जाता है, रुपया वही इकट्ठा करता है जिसके जीवन में असली चीज़ की कमी हो। जब असली मिल जाता है न, तो फिर ये सब छूट जाता है ।
