राजेश खन्ना की फिल्म अमर प्रेम का एक गाना याद आ रहा है, आर डी बर्मन का संगीत , आनंद बख़्शी के बोल और किशोर कुमार की आवाज का जादू …
” चिंगारी कोई भड़के, तो सावन उसे बुझाये
सावन जो अगन लगाये, उसे कौन बुझाए ? ”
ऐसा ही कुछ जनता के साथ हो रहा है ? सरकार का काम है कि जनता को सरकारी आर्थिक भृष्टाचार से मुक्ति मिले तो सरकार ने लोकायुक्त का गठन किया I मध्यप्रदेश लोकायुक्त एक राज्य स्तर पर भ्रष्टाचार-विरोधी मामलों की जांच करने वाली एक स्वतंत्र और वैधानिक संस्था है। इसका मुख्य उद्देश्य सरकारी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के खिलाफ भ्रष्टाचार व कदाचार की निष्पक्ष जांच करना है ताकि प्रशासन में पारदर्शिता बनी रहे ! लेकिन हुआ क्या ? वो तो खुद ही भृष्टाचार में डूबी हुई संस्था निकली ?
‘ मझधार में नैया डोले, तो मांझी पार लगाये
मांझी जो नाव डुबोए, उसे कौन बचाए ? ‘
असलियत तो ये है कि लोकायुक्त में प्रतिनियुक्ति पर बैठे अधिकारी – कर्मचारी भृष्टाचारियों को इसलिए पकड़ते थे कि उनसे उगाही कर सकें ? पहले बकरों को पकड़ो और फिर हलाल करो, लोकायुक्त नहीं हो गया, बूचड़खाना बन गया ? जब भृष्ट बकरे पकड़े जाते हैं तो पकड़ने वाले कथित ईमानदार कसाइयों ( अफसरों – सिपाहियों ) के नाम छापे जाते हैं लेकिन जब यही भृष्टाचारियों को पकड़ने वाले लोकायुक्त जैसी पवित्र जगह पर बैठ कर उन्ही भृष्टों को बचा रहे होते थे और लोकायुक्त की गरिमा, उद्दैश्य के विपरीत भृष्टता का नँगा नाच कर रहे होते थे तो किसी को कानों – कान खबर नहीं होती थी, ना पुलिस अधीक्षक को ना ही महानिदेशक को ? ना ही किसी अन्य सक्षम अधिकारी को ?
लेकिन दैनिक भास्कर ने जिम्मेदारी उठाई और लोकायुक्त में जमे दीमकों को दुनिया के सामने लाने के लिये लोकायुक्त भवन के अंदर ही ऐसा जाल बिछाया कि लोकायुक्त संस्था की दीवारों से, फाइलों से, कुर्सी की लकड़ियों में से दीमक खुद ही निकल निकल के बाहर आ गये और दैनिक भास्कर के खोजी पत्रकार सुधीर बिश्नोई और उनकी इन्वेस्टिगेशन टीम ने सबका सफाया कर के पूरे देश को चौँका दिया ? जब भृष्टाचार को रोकने वाले सिपाही ही भृष्टाचार कर रहे हों तो उस देश को कौन बचा सकता है ? सरकार भृष्टों को पकड़ने के लिये मोटा वेतन भी देती है, सुविधाएं भी देती है लेकिन लालच , कामनाएं ही इंसान की दुश्मन हैं, 2 कर्मचारी बर्खास्त कर दिये गये ? उन बेईमानों को 10000 रुपए महीने की सेक्यूरिटी गार्ड की नौकरी भी मिल जाये तो गनीमत है लेकिन सरकारी नौकरी में बैठ के गर्रा रहे थे और ऊपरी कमाई कर रहे थे ?
ऊपरी कमाई क्यों चाहिये ? क्योंकि कुछ कामनाएं, तमन्नायें पूरी करनी हैं, अब निलंबित और बर्खास्त होने के बाद दर दर भटकेंगे कि कहीं से इतना मिल जाये की सूखी दाल रोटी खा सकें ? अब ये किसी को क्या लूटेंगे ? वकील और कानून इन रिश्वत खोरों को भिखारी बना देगा ? अरे एक छोटा सा घर हो, छोटा सा परिवार हो, एक दुपहिया / चार पहिया वाहन हो, दिखावा ना हो, इतनी कमाई हो कि खाना पीना हो सके, इसमें क्या दिक्कत है ? याद रखिये तुम्हारे सुख ही तुम्हारे दुख हैं और तुम्हारी अनर्गल इच्छायें ही तुम्हारे विनाश का कारण हैं ! लोकायुक्त में भृष्टाचार का पर्दाफाश करना कोई मामूली काम नहीं था, शेर की मांद में घुसकर शेर को मारने जैसे असंभव काम को दैनिक भास्कर की टीम ने कर के दिखाया है, उनको सलाम है !
एक और पूरे देश में रिश्वतखोरी, लूट, जुगाड़, धोखाधड़ी, छल, कपट, फरेब, और जालसाजी का बोलबाला है और पूरे देश की मीडिया सत्ता की गोद में बैठकर सत्ता की दलाली कर रही है और जनता और देश के साथ विश्वासघात कर रही है , ऐसे में दैनिक भास्कर की चौँकाने वाली पत्रकारिता जनता के दिल और जहन में एक विश्वास जगाती है कि ” उम्मीद अभी बाकी है ? ” , भृष्टाचार विश्व सूचकांक में भारत का नंबर 180 देशोँ में 91वें नंबर पर है जो दर्शाता है कि भारत में सार्वजनिक क्षेत्रों में आर्थिक भृष्टाचार व्यापक स्तर पर है और देश को खोखला कर रहा है I हमारे पड़ोसी देश भी आर्थिक भृष्टाचार में हमारे आसपास ही हैं .. नेपाल (109) और श्रीलंका (107) बांग्लादेश (150), पाकिस्तान (136) और हाँ हम बहुत तेजी से , मेहनत से उनका मुकाबला कर रहे हैं , उम्मीद है कि जल्द ही भारत अपने प्रतिद्वंदियों को पछाड़ देगा ?
