कबीर साहब जैसा कह गये हैं वैसे ही NDTV के एसोसिएट एडिटर अनुराग द्वारी ने एक शूरवीर की तरह सत्ता के दबाव में झुकने से इंकार करते हुए, इंदौर के डॉन, राजनीति के दबंग नेता कैलाश विजयवर्गीय की बदतमीजी का दो टूक जवाब दिया, पत्रकार का उग्र व्यहवार ये दर्शाता है कि एक खुद्दार इंसान, जिसके पास मनुष्य की चेतना है वो ज्यादा समय गुलामी की जंजीरों में कैद नहीं रह सकता ! तमाम तरह के बंधनों में बंधा इंसान स्वाभाविक रूप से मुक्ति पाने के लिये , शांति पाने के लिये ही तो गुलामी स्वीकार करता है, लेकिन वो मुक्ति तो पाता नहीं बल्कि बंधनों , दुख, पीड़ा के अथाह दलदल में फंस के रह जाता है ! सामाजिक आदमी जो अपनी अहंवृत्तियों ( लालच, कामनाओं ) के वश के चलते समाज के बंधे बंधाये ढर्रों में फंसकर एक पशुवत जिंदगी जीने को मजबूर हो जाता है और समय की धूल बन कर रह जाता है !
कुछ बिरले ही ही होते हैं जो इन बंधनों से ऊपर उठकर सत्य के पथ पर चलते हैं और अमर हो जाते हैं, प्रहलाद ने अपने शक्तिशाली और अत्याचारी पिता के आगे झुकने से इंकार कर दिया था, चाहता तो असत्य और अधर्म का साथ देता और संसार के हर भौतिक सुख को प्राप्त कर सकता था I भगत सिंह, खुदीराम बोस और अनेकों खुद्दार युवा आजादी के दीवाने, अल्प आयु के युवक जान गये थे कि आजादी से बड़ी कोई अय्याशी नहीं हो सकती और उन्होंने अपनी जान देकर आजादी को गले लगा लिया था ! गुरु नानक, महावीर, बुद्ध सत्य और बोध पर चले और अमर हो गये, महात्मा गाँधी, विवेकानंद, डा राम मोहन राय, मदन मोहन मालवीय जैसे अनेकों महान विभूति हुए जो समाज की भीड़ से अलग चले, चेतनारहित समाज को एक नई दिशा दी और कालजयी हो गये ! डॉ. बी.आर. अंबेडकर, सुभाष चंद्र बोस सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे विचारक; ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और सी.वी. रमन जैसे वैज्ञानिक; तथा रानी लक्ष्मीबाई और सावित्रीबाई फुले जैसी महिला हस्तियाँ भी हैं हैं जिन्होंने समाज की बंधे बंधाये हुए संस्कारों को मानने से इंकार करा और शाश्वत हो गये I
पत्रकार अनुराग द्वारी ने जो हुंकार भरी है वो तो पत्रकार के खून में होनी चाहिए, इसमें इतनी हायतौबा क्यों ? समाज को आश्चर्य इसलिए हो रहा है क्योंकि कुछ सालों से समाज ने पत्रकारों को सत्ता की चाटुकारिता और गुलामी करते ही देखा है, बिकते देखा है, लालच, कामनाओं के लिये ईमान को बेचते देखा है ! भारत को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी दिलाने में पत्रकारों ने अहम योगदान दिया है , जिनमें गणेश शंकर विद्यार्थी , बाल गंगाधर तिलक , मदन मोहन मालवीय जैसे अनेकों नाम प्रमुख हैं ! लेकिन वर्तमान में चल रहा सत्ता और पत्रकारिता का ऐसा गठजोड़ भारत में कभी नहीं देखा गया , अब पिछले करीब डेढ़ – दो दशक से मीडिया पूंजीपतियों के हाथों की कठपुतली बन चुका है और पत्रकार बंधुआ गुलाम बन कर रह गये हैं ! ऐसे में अनुराग द्वारी एक क्रांतिकारी पत्रकार के रूप में उभरे हैं, जब सब गद्दारी का चोला ओढ़े हों तो क्रांति की मशाल उठाने का काम सिर्फ संत कबीर का सूरा ही कर सकता है !
अनुराग द्वारी ने जो किया वो तो पत्रकारिता का धर्म है लेकिन पूंजीपतियों के गुलाम पत्रकारों ने तो सत्ताधारियों से आँख मिलाना तो दूर सवाल पूछना ही बंद कर दिया है , आज भारत में मीडिया इसलिए नहीं है कि खबरें जनता तक पहुंचे बल्कि मीडिया का अस्तित्व सिर्फ इसलिए है कि जनता तक खबरें पहुंचने ही ना पाएँ, लेकिन विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भी कई जुझारू पत्रकार और मीडिया संस्थान अपने आत्मसम्मान की मशाल जलाये रखे हैं जिन्होंने अपने जमीर को बिकने नहीं दिया, अनुराग द्वारी उसी खुद्दार संस्था NDTV के एक गैरतमंद पत्रकार हैं, प्रणब रॉय के NDTV के पत्रकारों ने तो गौतम अदानी की गुलामी करने से इंकार कर दिया था लेकिन अनुराग द्वारी NDTV में ही रहे .. खैर शायद प्रणब रॉय की संगति का ही असर है कि अंततः उन्होंने सत्ता की गुलामी की जंजीरो को गिरा ही दिया और अपने आत्मसम्मान की रक्षा करते हुए अपने डरों पर, लालच पर विजय पा ही ली !
अनुराग द्वारी का नाम हमेशा याद रखा जायेगा कि जब देश का पूरा मीडिया सत्ता का गुलाम बन चुका था , अपने छोटे छोटे स्वार्थों के लिये रोज घुटनों पर रेंग रहा था तब एक पत्रकार ने चिंगारी भड़का कर पत्रकारिता को रोशनी देने का बीड़ा उठाया है , अनुराग द्वारी को सलाम है !
