भारत सरकार ने जैसे सरकारी संपत्तियों का मुद्रीकरण ( Monetization ) करने के लिये विनिवेश विभाग खोला था, सरकार द्वारा कई लोक संपत्तियों को औने – पौने दामों में बेचा गया था और पैसा उगाहा गया था, मीडिया और विपक्ष द्वारा ये मुद्दा खूब उठाया गया फिर विनिवेश का मुद्दा अचानक मीडिया से गायब हो गया , वैसे ही सरकार ने शहरों, गावों, रेलवे स्टेशनों, सड़कों , इमारतों का नाम बदलने के लिये एक विशेष विभाग ” नाम बदल विभाग ” खोला है , लेकिन अब लोक संपत्तियों को बेच के ‘ पैसा ‘ नहीं बल्कि लोक संपत्तियों का नाम बदलकर ‘ वोट ‘ उगाहे जाने का कार्यक्रम निरंतर चलाया जा रहा है I इलाहाबाद को प्रयागराज, रेस कोर्स रोड को लोक कल्याण मार्ग जैसे अनेकों नाम बदले गए और अब प्रधानमंत्री कार्यालय का नाम बदलकर ” सेवा तीर्थ ” और राज भवन का नाम बदलकर ” लोक भवन ” करने का फैसला लिया गया है I
सेवा तीर्थ में क्या आम आदमी तीर्थाटन कर सकेगा ? सेवा तीर्थ से सेवा की उम्मीद तो छोड़िये आम आदमी तो कर्तव्य पथ या लोक कल्याण मार्ग में घुस भी नहीं सकता , ये कैसा लोक कल्याण है जहां से ‘ लोक ‘ ही गायब है ? ‘ सेवा तीर्थ ‘ में उन्ही का प्रवेश संभव है जो सेवा तीर्थ का कल्याण कर सकें ! सेवा तीर्थ में पूँजीपति अपने व्यापार को अप्रीतम सफलता दिलाने हेतु हमेशा अपनी तिजोरी का ढक्कन खोले प्रवेश पाने को बेताब रहते हैं .. उनका बेरोकटोक प्रवेश सुनिश्चित होता है ! उसके बाद पूँजीपति मीडिया के मालिक हमेशा सेवा तीर्थ में नत मस्तक रहते हैं , नतमस्तक मीडिया ने जी हुजूरी की सारी मर्यादाओं का ताक पर रख दिया है ! पाखंडी धर्म गुरु ” सेवा तीर्थ ” में लोकधर्म की सेवा का प्रण लेने के लिये सेवा तीर्थ के दर्शन लाभ हेतु निर्बाध रूप से आते – जाते रहते हैं और सेवा तीर्थ में गुलाम नौकर शाहों का प्रवेश निर्विध्न रूप से संभव है जो सेवा तीर्थ को हर संभव खतरे से बचाएं रखने मे सहयोगी है !
प्रधानमंत्री कार्यालय का नाम बदलकर ” सेवा तीर्थ ” करने से क्या होगा ? ईंट – कांक्रीट से बना चेतनाहीन भवन में क्या चेतना का संचार हो जायेगा ? या दीवारें संवेदनशील हो जायेंगी ? या टेबल – कुर्सियों में करुणा का संचार हो जायेगा ? या नाम बदलने से उसमें कार्यरत महानुभवों में विवेक, बोध या आत्मज्ञान जागृत हो जायेगा ? किसी आम सांसारिक इंसान का नाम ‘ राम ‘ रख दोगे तो क्या वो भोग – विलास, लालच, झूठ, षड्यंत्र, कामना, इर्ष्या, क्रोध से दूर हो जायेगा ? क्या रावण का नाम राम रख देने से उसका अहंकार खतम हो जाता ? रामदेव बाबा का तो राम नाम के साथ पूरा जीवन व्यतीत हो गया लेकिन काम तो उनके पूरे भोगी के ही हैं ,बेईमानी के हैं, छल – कपट के हैं ! राम नाम से कोई मर्यादित पुरुषोत्तम नहीं हो जाता, राम – रहीम को कौन नही जानता ? ढोंगी, बलात्कारी, भोगी बाबा .. नाम राम का और काम दुशासन के ?
स्वामी नित्यानंद भारत का एक बेईमान और बलात्कारी दौलतमंद बाबा है , नित्यानंद याने जो हमेशा आनंदित रहे , प्रभु कृष्ण और भगवान शिव को भी नित्यानंद की उपाधि से सुशोभित किया जाता है, और हिंदुस्तान की कामना युक्त धार्मिक अंधविश्वासी जनता ने एक अपराधी को स्वामी नित्यानंद बना दिया ? भगवान शिव और कृष्ण का नाम भी उसे इंसान नहीं बना सके ? एक बृजभूषण सिंह हैं, राजनीतिज्ञ हैं , बृज भूषण का मतलब होता है ‘ बृज का रक्षक ‘ जो श्री कृष्ण के लिये उपाधि के रूप में उद्धृत होता है , बृज का रक्षक ही अपने बृज की महिला खिलाडियों का भक्षक बन गया ? नाम तो असल में पर्दा हो गया है .. हिंदुस्तान में कई स्वामी ( ढोंगी बाबा ) हैं, जिन्होंने हिंदुस्तान में बड़े बड़े धार्मिक, अध्यात्मिक डेरे , आश्रम खोल रखे हैं, आश्रम की बड़ी – बड़ी, ऊँची दीवारें बना रखी हैं लेकिन आश्रम के अंदर सारे पाप होते हैं, आसाराम बापू के हिंदुस्तान में 400 आश्रम थे और करोड़ों अनुयायी थे, लेकिन आसाराम बापू दो बच्चियों के साथ बलात्कार करने की सजा भुगत रहा है ? नाम में बापू लगा है लेकिन काम छिंछोरों जैसे ? नाम की गजब माया है, सुर्योधन का नाम दुर्योधन किसने रखा ? सुशासन का नाम दुशासन किसने रखा ? कोई अपने बेटों का नाम दुशासन और दुर्योधन रखता है ? उनके कर्म देख के ही तो नाम बदले गये होंगे ?
भारत सरकार का सोचना है कि नाम बदलने से कर्म बदल जायेंगे ? क्या सेवा तीर्थ नाम रखने से आम जनता के लिये प्रधानमंत्री के सेवा तीर्थ भवन के द्वार खोल दिये जायेंगे ? क्या प्रधानमंत्री के दर्शन कर के गरीब, असहाय, त्रस्त जनता के सारे कष्ट दूर हो जायेंगे ? प्रधानमंत्री का कार्यालय नहीं हो गया तीर्थ हो गया ? और प्रधानमंत्री तीर्थकर ? तीर्थकर याने वह व्यक्ति जिसने स्वयं जन्म और मृत्यु के चक्र से पार पा लिया है और दूसरों के लिए भी एक मार्ग प्रशस्त किया है .. क्या ऐसा है ? प्रधानमंत्री कार्यालय तो सत्ता का केंद्र है, तो ये कैसा सेवा तीर्थ है ? यहाँ इतनी भुखमरी क्यों है ? इतनी अशिक्षा क्यों ? इतना ज्यादा कुपोषण क्यों है ? सेवा में कहाँ कमी है ? सेवा तीर्थ है तो देश में इतने बलात्कार क्यों ? इतने अपराध क्यों ? इतना भृष्टाचार क्यों ? क्या क्या लिखें ? सेवा तीर्थ को एक पत्रकार का दूर से नमस्कार है , 11 वर्ष से पत्रकारों को सेवा तीर्थ को समीप से नमस्कार करने का मौका जो नहीं मिला है !
