आज के दौर में पत्रकारों की दुनिया बड़ी ही विचित्र है, अनोखी दुनिया होती है पत्रकारों की , पत्रकारिता एक नशा है और नशे की तरह लत है , बेइंतिहा लत, ऐसा चस्का कि शराब भी शर्मा जाये I पत्रकारिता की खुमारी तो उतरती ही नहीं I मैं देख रहा हूं कि पत्रकारों की जवानी खप गयी, बुढ़ापा भी खर्च हो गया, जीवन का अंतिम दौर भी हांफते दम – खम के साथ पत्रकारिता की अलख जलाये घूमता रहता है, पत्रकारों की सेवा निवृति नहीं होती, सेवा करते करते पत्रकारों की निवृति होती है, पत्रकार का हर दिन एक चुनौती होता है, नौकरी करता पत्रकार किसी खबर की खोज में दिन भर सघन सूंघ अभियान में व्यस्त रहता है या अपनी तनख्वाह के लिये विज्ञापन की तलाश करता है और स्वयं के प्रकाशन का प्रकाशक ( मालिक ) अपने रिपोर्टरों की लोकेशन लेने में मसरूफ रहता है I
पत्रकारों के नाम पर अनेकों ” पत्रकार संगठन ” संचालित हो रहे हैं , पत्रकार कई संगठनों के साथ जुड़े रहते हैं और भांति – भांति के संगठनों के स्थाई अध्यक्ष पत्रकारों के अधिकारों के लिये लड़ते हैं, पत्रकारों की सुरक्षा, पत्रकारों का जीवन बीमा, बुजुर्ग पत्रकारों की पेंशन आदि जैसे कई मसलों पर सरकार से सवाल – जवाब और संघर्ष करते हैं , कई पत्रकार संगठन वास्तविक रूप से पत्रकारों के हित में संघर्ष कर रहे है लेकिन अधिकांशतः पत्रकार संगठन बस यूं ही अध्यक्ष ( स्वयं भू ) के स्वार्थ पूर्ति के लिये संचालित किये जाते हैं , गांव – कस्बे के पत्रकार कुछ पैसे देकर ऐसे संगठनो से जुड़ कर सुरक्षित महसूस करते हैं , पत्रकारों की अनोखी दुनिया में तथाकथित ” पत्रकार कल्याण संगठन ” पत्रकारों की जीवन रेखा हैं , पत्रकार के अंदर पहचान की तीव्र भूख होती है खासकर जिला – तहसील स्तर के संगठन , पत्रकारों को एकत्रित करते हैं और खुद पत्रकार ही पत्रकारों के साथ मिली भगत कर के पुरुस्कारों की बंदर बांट कर लेते हैं , बकायदा जिले के किसी नेता या अधिकारी के हाथों नारियल, शाल और स्मृति चिन्ह प्रदान किया जाता है I पत्रकारों का छद्म संसार यूं ही परवान चढ़ता रहता है और कथित पत्रकार ” मुंगेरी लाल के हसीन सपने ” की तर्ज पर खयाली पुलाव पकाता रहता है, पत्रकार संगठन के नाम पर कई पत्रकारों की रोजी – रोटी चल रही है I
अब झोला लटकाये पत्रकारों के जमाने लद गये, अब पत्रकार किसी महंगी यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की डिग्री लेकर किसी पूँजीपति के कथित मीडिया हाउस में गुलामी करते हैं, अब पत्रकारिता एक कॅरिअर हैं जुनून नहीं I पत्रकार , सरकार और जनता के बीच एक धुरी होता है, सत्यनिष्ठ, नेकनीयत होता है I लेकिन अब सब कुछ उलट पलट हो गया है, पत्रकारिता अब भृष्ट तंत्र का हिस्सा हो गया है,, लाभ – हानि का शुद्ध व्यापार हो गया है I
अब तो छद्म ब्रेकिंग न्यूज़ का दौर है, नेता जी का सब्जी खरीदते दिखाना पत्रकारिता है, विशुद्ध परजीवी चाटुकार , नेताओं के साक्षात्कार ले रहे हैं और अब तो नेता भी ऊंचे दर्जे के भांडो को इंटरव्यू दे रहे हैं , अब तो पत्रकारिता खबर नही दिखाती बल्कि पत्रकारों के बड़े – बड़े व्यापारिक संस्थान का अस्तित्व ही इसलिए बचा है कि क्योंकि उनका काम जनता का खबरे दिखाना नहीं बल्कि असल खबरें जनता तक नहीं पहुँचने देना है I अब मीडिया हाउस, कॉर्पोरेट में तब्दील हो चुके हैं, कॉर्पोरेट मतलब विशुद्ध लाभ – हानि पर टिका व्यापार, खबरें दिखाने से पैसे मिलेंगे तो खबरें दिखाएंगे और अगर खबरें छुपाने से पैसा आता है तो खबरें नहीं दिखाएंगे, व्यापार में कोई संवेदना नहीं होती, कोई करुणा, कोई सहनुभूति, दया जैसा शब्द नहीं होता .. खल्लास सौदागिरी I
पत्रकारिता जैसे ऊँचे दर्जे के पुनीत कार्य को औसत दर्जे के लोगोँ ने जीवन यापन का जरिया बना लिया है, ना तो वो लेखन में पारंगत होता है ना ही उसका राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक परिवेश का कोई गहराई से ज्ञान होता है I एक समय था कि नेता, मंत्री, समाजसेवी संगठन , सेलेब्रिटी पत्रकारों को बाइज्जत बुलाते थे, साक्षात्कार देते थे , कथित वी आई पी का टेग लगाए लोग पत्रकारों का पीछा करते थे और आज इसके उलट पत्रकारों की भीड़ घंटो वी आई पी के घर के बाहर भिखारियों की तरह एक बाइट की भीख पाने के लिये शर्मनाक तरीके से खड़ी रहती है I
सीधी रीढ़ के पत्रकारों को कमतर ना समझियेगा, आजादी के बाद कर्रे कर्रे सरकारी अधिकारियों ,पूंजीपतियों को जेल की चक्की और सफेद पोश नेताओं को समय से पहले वैराग्य दिलवा दिया है जुनूनी पत्रकारों ने , भारत की आजादी में तो पत्रकारों की प्रमुख भूमिका थी, महात्मा गाँधी ने ‘यंग इंडिया’ और ‘हरिजन’ जैसे समाचार पत्रों के माध्यम से, ब्रिटिश शासन के खिलाफ अहिंसक प्रतिरोध आंदोलन का नेतृत्व किया था, लोकमान्य तिलक ने ‘केसरी’ और ‘मराठा’ जैसे समाचार पत्रों के माध्यम से, लोगों में राष्ट्रीयता की भावना को जगाया , गणेश शंकर विद्यार्थी ने ‘प्रताप’ जैसे समाचार पत्र के माध्यम से, किसानों और मजदूरों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई थी I आजादी के बाद भी अंग्रेजों की तर्ज पर भारत की जनता को भारतीय नेताओं, लोक सेवकों, अमीरों और पाखंडी धर्म गुरुओं ने संगठित रूप से लूटना जारी रखा, उनकी लूट और घोटालों को अनेकों पत्रकारों ने अपने जुनून , देशप्रेम , जनता के प्रति अपने कर्तव्य और पत्रकारिता के प्रति दीवानेपन के चलते उजागर किये I
निस्संदेह, ये सभी हमें इस बात की प्रेरणा देते हैं कि मेहनती खोजी पत्रकारिता अत्यंत मूल्यवान क्यों है ? आज के दौर में पत्रकारिता और पत्रकार जिस मुहाने पर खड़े हैं वो सबसे निकृष्ट दौर है , सत्ता केंद्रित पत्रकारिता के लिये अपनी आजीविका को, परिवार की आर्थिक जरूरतों को ढाल बनाते हैं लेकिन ये बिल्कुल भी सत्य नहीं है, पत्रकारिता पेशा नहीं है एक जुनून है, मिशन है, अंग्रेजो से लड़ते जांबाज क्रांतिकारी के भी परिवार थे, तमाम तरह के मोह माया में वो भी फंसे थे लेकिन आजादी पाना उनका लक्ष्य था जिसके लिये उन्होंने अपना वर्चस्व कुर्बान कर दिया I
सच्चे पत्रकार का धर्म है कि भारत की जनता को कुटिल घोटाले बाज नेताओं, भृष्ट नौकर शाहों, पाखंडी धर्म गुरुओं ( बाबाओं ) , सत्ता की गोद में बैठे मीडिया हाउस और पूंजीपतियों के गठजोड़ से बचाना है , ना सिर्फ जनता को गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, भुखमरी से बचाना है बल्कि देश को प्रगति, खुशहाली, तरक्की की राह पर अग्रसर करना है .. यही पत्रकारिता है, यही पत्रकारिता का धर्म है I
