दिल्ली हाई कोर्ट ने समाचार पोर्टल न्यूज़क्लिक और उसके संस्थापक और प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ के ख़िलाफ़ दिल्ली पुलिस की एफ़आईआर और ई. डी. की मनी लॉन्ड्रिंग जाँच को रद्द कर दिया है ! अदालत ने कहा, “मौजूदा कार्यवाही न केवल दुर्भावनापूर्ण है, बल्कि याचिकाकर्ताओं की स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता के ख़िलाफ़ शक्तियों का मनमाना हमला और दुरुपयोग भी है ” I
सोचिये एक निष्पक्ष न्यूज़ चैनल के मालिक को ED गिरफ्तार करती है और 6 – 7 महीने बिना किसी ठोस आरोप के UAPA के अंतर्गत अवैद्य रूप से जेल में रखती है, कर्मचारियों को भी धमकाया जाता है, न्यूज़ क्लिक के 100 कर्मचारी बेरोजगार हो जाते हैं, चैनल बंद हो जाता है , प्रबीर पुरकायस्थ की सालों की मेहनत, उनका संघर्ष प्रवर्तन निदेशालय की पक्षपातपूर्ण कार्यवाही से ध्वस्त हो जाते हैं साथ ही 100 परिवार और प्रबीर पुरकायस्थ दिवालिया होने की कगार पर आ जाते हैं I
क्या ED से और उससे संबंधित लोगों से प्रबीर पुरकायस्थ और उससे जुड़े 100 परिवारों के दिवालिया होने का हर्जाना वसूला जायेगा ? क्या प्रबीर पुरकायस्थ के 6 महीने जेल में रहने की कीमत ED के कर्मचारियों / अधिकारियों और उनके आकाओं से ब्याज सहित वसूली जायेगी ? जिन्होंने भी ED के झूठी चार्जशीट बनाई क्या उनको 6 महीने जेल नहीं भेजना चाहिए ताकि उनको पता चले कि ” यूं ही ” जेल जाने के दुष्परिणाम क्या होते हैं ? उनके परिवार को, उनके बच्चों को कितने सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक यातनाएं झेलनी पड़ती हैं ? क्या उनको भी जेल नहीं भेजना चाहिए जो राजनीतिक फायदा उठाने के लिये ‘ न्यूज़ क्लिक ‘ और उसके संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ को बदनाम करने के लिये कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे ? एक नेता तो बकायदा ‘ प्रेस कांफ्रेंस ‘ कर के चीन और न्यूज़ क्लिक के संबंधों की कड़ियां जोड़ रहे थे ?
एक जांबाज, निडर, निष्पक्ष पत्रकार याने जो देश और जनता की भलाई के लिये पत्रकारिता कर रहा हो उसके लिए तो जनता को आगे आना चाहिए ना ? प्रबीर पुरकायस्थ के लिए कौन आवाज उठा रहा है ? क्या वो अपने लिये सारी जद्दोजहद कर रहे थे ? अगर उनको बिकना ही होता तो जनता की गोदी में बैठने के बजाए सरकार और पूंजीपतियों की गोदी में बैठ जाते, याद रखिये हर शख्स बिकाऊ नहीं होता और यही तो कारण है कि प्रबीर पुरकायस्थ के पीछे पुलिस और इंफोर्समेंट डायरेक्ट्रेट हाथ धो के पीछे पड़ गये थे ? प्रबीर पुरकायस्थ बिक गये होते तो अभी तक तो उन्हें किसी यूनिवर्सिटी का कुलगुरु भी बना दिया गया होता ?
दुख इस बात का होता है कि प्रबीर पुरकायस्थ ने ईमानदारी से पत्रकारिता की , जनता के मुद्दों को उठाया लेकिन उनके कठिन दिनों में किसने साथ दिया ? क्या कोर्ट का निर्णय आने के बाद जनता ने ED की झूठी कार्यवाही का विरोध किया ? जनता की तो छोड़िये, झुकी रीढ़ के पत्रकार तो ‘ न्यूज़ क्लिक ‘ का नाम लेने तक डरते हैं कि कहीं जो उनको चूसी हुई हड्डी के अवशेष परिवार चलाने के लिये उनके सामने फेंक दिये जाते हैं ऐसा ना हो कि वो मिलना भी बंद हो जाएं ? ईमान – धर्म, रीढ़, ईमानदारी, प्रेम की बातें हिंदुस्तान में अब अतीत की बातें हो चुकी हैं , पत्रकार बिरादरी को भी समझना चाहिए कि ईमान बेच के गुलामों सी प्रवृत्ति कुछ पैसे तो दिला देती है लेकिन तिरस्कृत भरी जिंदगी क्या उन्हें सुकून – शांति दे पायेगी ?
कुछ ऐसा करो कि सत्य और ईमानदारी से समझौता ना करना पड़े ? अगर पत्रकारिता में समझौते करने पड़ रहे हैं तो छोड़िये इसको ? बहुत काम हैं जिनको कर के परिवार का पेट तो पाला ही जा सकता है .. वो करिये ? पेट भरना, सोना और नर – मादा के खेल तो जड़ बुद्धि पशुओं के जंगलों में भी चलते हैं तो फिर चैतन्य मनुष्य और चेतना शून्य पशुओं में क्या फर्क रहा ? चेतना युक्त शरीर मिला है तो समाज में भी चेतना की जागृति फैला के जाइये या यूं ही जानवरों की मौत मरना है ?
डाकू रत्नाकर जंगल में लोगों की गर्दन काटकर गहने लूटकर अपना और अपने परिवार का पेट पालता था, एक दिन डाकू अपनी पत्नि से बोला कि मैं पापी हूं और अवश्य ही नर्क जाऊंगा ” क्या तुम मेरे साथ दोगी और मेरे साथ ‘ नर्क ‘ चलोगी ? डाकू रत्नाकर की पत्नि बोली तुम्हीं जाना नर्क, मैं क्यों जाऊंगी नर्क ? तुम्हारे पाप हैं तुम्हीं भुगतो ? ये सुनकर डाकू रत्नाकर ग्लानि और क्षोभ से भर गया और बाद में उन्होंने महर्षि वाल्मीकि बनकर वाल्मीकीय रामायण की रचना की , भगवान वाल्मीकि ने २४००० श्लोकों में श्रीराम उपाख्यान ‘रामायण’ रचा।
अगर बुद्ध, महावीर, गुरु नानक, संत कबीर, महात्मा गाँधी, शहीद भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय जैसे अनेकों संतों, क्रांतिकारियों, ज्ञानियों ने अपने स्वार्थों के साथ समझौता किया होता तो क्या दुनिया आज रहने लायक होती ? सोचियेगा ?
