आज मध्यप्रदेश के एक जिले के कोर्ट में जाना हुआ, न्याय के मन्दिर की जर्जर दीवारें न्याय की गुहार लगा रही थीं, न्याय कब टूट कर न्याय की आस में आये गरीबों की खोपड़ी फोड़ दे किसी को नहीं पता ? वहां बैठे बैठे सोच रहा था कि ये न्याय का जर्जर मन्दिर कितनी पेशी झेलेगा ? एक दिन तो बीम स्वयं ही टूट कर कर अपना तनाव खत्म कर ही देगा , खुदगर्ज बीम को तो राहत मिल जायेगी लेकिन इसके नीचे खड़े न्याय की गुहार की आस में आये गरीब ऊपर वाले की अदालत में सीधे पेश हो जायेंगे तब हमारे तंत्र की कुंभकरणीय नींद शायद भंग होगी और जिले के कलेक्टर, एस डी एम, पुलिस अधीक्षक और ( गैर ) जिम्मेदार सरकारी अधिकारी शायद मुस्तेदी से जिले, राज्य के सभी प्रकार के न्यायालयों की जर्जर होती इमारतों का आंकलन करेंगे .. नेतागण हताहत हुए न्याय की गुहार लगाते गरीबों को स्थायी न्याय मिलने पर कुछ पैसे वगैरह देकर खानापूर्ति करने की रस्म निभायेंगे और फेसबुक, इंस्टाग्राम पर अपना दुख प्रकट करेंगे !
मेरी सोच को जब विराम लगा जब न्यायालय के गलियारे में एक काले कुत्ते ने मुझ पर भौंका क्योंकि में शायद उसकी स्थायी जगह पर अतिक्रमण किया हुआ था , मैं डर के भागा तो कोर्ट में बैठी गाय से टकराकर गिर पड़ा, कुत्तों पर हो रहे अत्याचार के लिये तो पशु प्रेमी सुप्रीम कोर्ट में लड़ रहे हैं लेकिन गाय बेचारी क्या करे ? गाय को माता – माता बोल के स्वार्थी इंसान उस पर इतना अत्याचार करता है कि दिल दहल जाए ? हमें बचपन से सिखाया जाता है कि गाय हमारी माता है वो हमें दूध देती है ? गाय क्या हमें स्वेच्छा से दूध देती है ? गाय अपने बच्चे के लिये दूध देती है लेकिन हम गाय को भीषण मानसिक और शारीरिक कष्ट देकर उसको लगातार कृत्रिम तरीके से गर्भवती कर के अपने फायदे के लिये दूध निकाल के बेचते हैं ! शायद गाय अदालत में न्याय की गुहार लगा रही थी .. लेकिन उसे क्या मालूम की यहां तो इंसानो की नही सुनी जाती तो गाय की क्या बिसात ?
गाय से टकराकर गिरा तो मुझे घुटने में चोट लग गयी .. मैंने एक वकील साहब की कुर्सी खिसका के उस पर बैठने की कोशिश की तो न्याय दिलवाने वाले वकील साहब की कुर्सी टस से मस नहीं हुई , ध्यान से देखा तो कुरसी लोहे कि चैन से टेबल से बंधी हुई थी ? न्याय के मन्दिर में वकील महोदय की कुर्सी गुलामी की जंजीरों में बंधी हुई, अपने ऊपर हो रहे अन्याय और बेबसी पर शायद रो रही थी , जिस कुर्सी पर बैठकर न्यायविद मोटी मोटी फीस लेकर दुनिया को न्याय दिलवाते हैं वो अपनी कुर्सी को आजादी नहीं दिलवा पा रहे ? अरे भाई कुर्सियों को टेबलों से क्यों बांध रखा है ? जबरदस्ती का बंधन क्यों ? अगर कुर्सी में चेतना होती तो न्याय के मन्दिर में गुहार लगाती कि इस बेमेल बंधन से आजाद करो मुझे ? लेकिन ना तो टेबल को कुर्सी चाहिए ना ही कुर्सी को टेबल की जरूरत है लेकिन समाज को जरूरत है दोनों की ! इसलिए तो समाज ने बाँधा हुआ है दोनों को कि कहीं भाग ना जायें ?
कचहरी के सभी गलियारे और कोर्ट रूम अहंकारियों से भरे पड़े थे , पैसों वालों का बड़ा वाला अहंकार होता है जिनके पास पैसा नहीं होता उनका भी अहंकार होता है , सारा कोर्ट नाते रिश्तेदारों की अकड़ , ठसक और अहं से भरा पड़ा था, पारिवारिक संपत्ति का विवाद, दहेज, घरेलू हिंसा, तलाक़, पति पीड़ित, पत्नि पीड़ित, भाई पीड़ित, बहन पीड़ित , भाई भी बैठा है, बहन भी , पत्नि भी बैठी है और पति भी .. दरअसल परिवार से निकलकर विवाद न्यायालय में आ जाते हैं और फिर शुरू होती है ऐसी जद्दोजहद कि विवादित संपत्ति तो अनाथ पड़ी रहती है लेकिन वादी – प्रतिवादी कोर्ट के खर्चे दे देकर अनाथ हो जाते है .. चेहरों पे चिड़चिड़ाहट, चिंताएँ लिये लोग गलियारों में ठुंसे पड़े थे, क्या उनकी चिंताएँ न्यायाधीश या वकील सुलझा सकते हैं ? पति – पत्नि अदालत में हर पेशी पर जाते हैं की उनके अनुसार न्याय मिलेगा लेकिन अन्याय तो उनके बच्चों के साथ हो रहा होता है .. न्यायालय में अंतहीन संघर्ष से कुछ भी हासिल नहीं होता .. जो भी विवाद हो जो बैठ के सुलझ सकते हों, उनको आपस में सुलझाना बेहतर है, छोटी सी जिंदगी है उसको, नौकरी करते न्यायाधीश और अपना व्यापार करते वकील के साथ क्यों खपाना ..
